Gram Pradhan Administrator: उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के संचालन को लेकर Yogi Government का हालिया फैसला अब न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें ही छह महीने के लिए प्रशासक नियुक्त किए जाने के सरकारी आदेश को Allahabad High Court की लखनऊ बेंच में चुनौती दी गई है। इस मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार से 3 जून को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।
याचिकाकर्ता Omprakash Prajapati ने कोर्ट में दावा किया है कि सरकार का यह निर्णय पंचायती राज व्यवस्था की मूल भावना और उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को प्रशासनिक अधिकार देना कानून की मंशा के विपरीत है।
Gram Pradhan Administrator: क्या है विवाद की जड़
UP Panchayat Dispute: उत्तर प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो गया था। इससे ठीक एक दिन पहले, 25 मई को राज्य सरकार ने एक आदेश जारी करते हुए निवर्तमान ग्राम प्रधानों को उनकी ही पंचायतों में प्रशासक नियुक्त कर दिया। यह व्यवस्था पंचायत चुनाव संपन्न होने तक या अधिकतम छह महीने की अवधि तक लागू रहेगी।
सरकार का तर्क है कि पंचायत चुनावों में संभावित देरी और पिछड़ा वर्ग आरक्षण से जुड़ी प्रक्रिया पूरी न होने के कारण प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया है। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से गांवों में चल रहे विकास कार्य और जनहित से जुड़ी योजनाएं बिना किसी बाधा के जारी रह सकेंगी।
याचिकाकर्ता ने उठाए कानूनी प्रश्न
जनहित याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3)(क) के अनुसार ग्राम प्रधान का कार्यकाल शपथ ग्रहण की तिथि से अधिकतम पांच वर्ष का होता है। ऐसे में कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसी व्यक्ति को प्रशासक बनाकर पंचायत का संचालन सौंपना अप्रत्यक्ष रूप से उसके कार्यकाल को बढ़ाने जैसा है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह व्यवस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है। उनका तर्क है कि यदि पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते हैं तो प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए, न कि उन प्रतिनिधियों को फिर से अधिकार दिए जाएं जिनका संवैधानिक कार्यकाल समाप्त हो चुका है।
पहले कैसे होती थी व्यवस्था
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि पूर्व में जब पंचायत चुनावों में किसी कारणवश देरी होती थी, तब पंचायतों के संचालन के लिए सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) यानी ADO पंचायत या अन्य सक्षम सरकारी अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता था।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह एक स्थापित प्रशासनिक परंपरा रही है, जो निष्पक्षता और कानूनी वैधता दोनों को सुनिश्चित करती थी। लेकिन इस बार सरकार ने उस परंपरा से हटकर निवर्तमान ग्राम प्रधानों को Gram Pradhan Administrator की जिम्मेदारी सौंप दी है, जिस पर सवाल उठ रहे हैं।
कोर्ट ने सरकार से मांगा स्पष्टीकरण
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति Shekhar B. Saraf और न्यायमूर्ति Awadhesh Kumar Chaudhary की खंडपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से शासनादेश और संबंधित कानूनी प्रावधानों का हवाला दिया गया।
चिकाकर्ता के अधिवक्ता Amarendra Nath Tripathi ने अदालत के सामने दलीलें रखते हुए आदेश की वैधता पर सवाल उठाए। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार के वकील को निर्देश दिया कि वह शासन से आवश्यक निर्देश प्राप्त कर 3 जून को अदालत के समक्ष सरकार का पक्ष प्रस्तुत करें। अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर टिकी हुई है, जहां सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि किन कानूनी और प्रशासनिक आधारों पर निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया है।
सरकार ने क्या दी है दलील
राज्य सरकार का कहना है कि पंचायत चुनाव में देरी होने की आशंका और आरक्षण प्रक्रिया पूरी न होने के कारण प्रशासनिक शून्यता की स्थिति पैदा हो सकती थी। ऐसे में गांवों में सफाई व्यवस्था, पेयजल आपूर्ति, मनरेगा कार्य, सड़क मरम्मत और अन्य विकास योजनाओं को प्रभावित होने से बचाने के लिए यह निर्णय लिया गया।
सरकार ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि प्रशासक के रूप में कार्य कर रहे ग्राम प्रधान कोई बड़ा या नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। यदि किसी विशेष परिस्थिति में महत्वपूर्ण निर्णय लेना आवश्यक हो, तो उसका प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी के पास भेजा जाएगा और जिलाधिकारी की मंजूरी मिलने के बाद ही उस पर अमल किया जाएगा।
राजनीतिक और कानूनी बहस तेज
ग्राम प्रधानों को Gram Pradhan Administrator बनाने का फैसला अब केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय भी बन गया है। पंचायत चुनावों के विधानसभा चुनावों के बाद होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में यह मामला आने वाले दिनों में और अधिक चर्चा का केंद्र बन सकता है।
हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई से यह तय होगा कि सरकार का यह कदम कानूनी कसौटी पर कितना खरा उतरता है। फिलहाल राज्य की हजारों ग्राम पंचायतों में निवर्तमान प्रधान प्रशासक के रूप में कार्यभार संभाल चुके हैं, लेकिन उनके अधिकारों और नियुक्ति की वैधता पर अंतिम फैसला अदालत के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा।
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