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Nitish Kumar को आरा-बक्सर में बड़ा चुनावी झटका लगा

 15 May 2026

Nitish Kumar Setbackबिहार की आरा-बक्सर स्थानीय प्राधिकार विधान परिषद सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। जनता दल यूनाइटेड (JDU) को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने जीत दर्ज कर महागठबंधन खेमे में नई ऊर्जा भर दी, जिसे नीतीश कुमार को झटका माना जा रहा है।


यह सीट पहले जेडीयू के कब्जे में थी, लेकिन उपचुनाव में आरजेडी उम्मीदवार ने जीत हासिल कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए। इस हार के बाद अब सवाल उठ रहा है कि आखिर मजबूत मानी जाने वाली सीट पर जेडीयू कैसे पिछड़ गई।

राधाचरण शाह के इस्तीफे से खाली हुई थी सीट

Bihar Political Battleआरा-बक्सर विधान परिषद सीट पर पहले राधाचरण शाह उर्फ सेठ जी जेडीयू के एमएलसी थे। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें संदेश विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था। चुनाव में उन्होंने आरजेडी उम्मीदवार अरुण यादव को हराकर जीत दर्ज की थी।

विधायक बनने के बाद उन्होंने विधान परिषद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया, जिसके कारण इस सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा। जेडीयू ने इस बार राधाचरण शाह के बेटे कन्हैया प्रसाद को उम्मीदवार बनाया। दूसरी ओर महागठबंधन ने आरजेडी के सोनू कुमार राय को मैदान में उतारा। 

चुनाव परिणाम ने सभी को चौंका दिया। सोनू कुमार राय ने 359 मतों से जीत हासिल कर सीट जेडीयू से छीन ली।

जलेबी बेचने से राजनीति तक पहुंचने वाले राधाचरण शाह

राधाचरण शाह की कहानी बिहार की राजनीति में अक्सर चर्चा का विषय रही है। कभी जलेबी की दुकान चलाने वाले राधाचरण शाह ने स्थानीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई और फिर एमएलसी से विधायक तक का सफर तय किया।

उनकी लगातार जीत को देखते हुए माना जा रहा था कि इस सीट पर जेडीयू की पकड़ मजबूत बनी रहेगी। लेकिन उपचुनाव के नतीजों ने यह धारणा बदल दी। 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार चुनाव में स्थानीय समीकरण और संगठनात्मक रणनीति ने बड़ा रोल निभाया।

पैराशूट उम्मीदवार बना हार की बड़ी वजह? 

Nitish Kumar Setbackजेडीयू की हार के पीछे सबसे बड़ा कारण उम्मीदवार चयन को माना जा रहा है। स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का कहना है कि कन्हैया प्रसाद को पैराशूट उम्मीदवार के तौर पर उतारा गया, जिसे राजनीतिक हलकों में नीतीश कुमार को एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

बताया जा रहा है कि इस सीट के लिए लंबे समय से मनोज उपाध्याय तैयारी कर रहे थे और स्थानीय संगठन में उनकी मजबूत पकड़ थी। लेकिन अंतिम समय में पार्टी ने कन्हैया प्रसाद को टिकट दे दिया।

इस फैसले से कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ गई। कई स्थानीय नेताओं ने खुलकर विरोध तो नहीं किया, लेकिन अंदरखाने असंतोष बना रहा। यही नाराजगी चुनाव परिणाम में दिखाई दी।

बागी उम्मीदवार ने बिगाड़ा खेल

Nitish Kumar Setbackचुनाव में बागी उम्मीदवार मनोज उपाध्याय की मौजूदगी भी जेडीयू के लिए नुकसानदायक साबित हुई, जिसे राजनीतिक विश्लेषक नीतीश कुमार को झटका के रूप में देख रहे हैं।

उपाध्याय को इस चुनाव में 636 वोट मिले। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ये वोट जेडीयू उम्मीदवार को मिलते तो मुकाबला पूरी तरह बदल सकता था। 

दूसरी तरफ आरजेडी उम्मीदवार सोनू राय ने बेहद संगठित तरीके से चुनाव लड़ा और महागठबंधन के वोटों को एकजुट रखने में सफल रहे।

सदस्यता को लेकर भी उठे सवाल

जेडीयू के अंदर यह चर्चा भी रही कि कन्हैया प्रसाद को टिकट दिए जाने के समय तक वे पार्टी के सक्रिय सदस्य भी नहीं थे।

स्थानीय स्तर पर यह बात तेजी से फैली कि पहले उन्हें उम्मीदवार बनाया गया और बाद में जल्दबाजी में पार्टी की सदस्यता दिलाई गई। इससे कार्यकर्ताओं के बीच असहज स्थिति पैदा हुई। 

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि स्थानीय संगठन को विश्वास में लिए बिना उम्मीदवार तय करना जेडीयू के लिए भारी पड़ गया।

महागठबंधन की माइक्रो प्लानिंग रही असरदार

इस चुनाव में महागठबंधन ने बूथ स्तर तक मजबूत रणनीति तैयार की थी। खासकर बक्सर से आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह की भूमिका अहम मानी जा रही है।

महागठबंधन ने स्थानीय जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की। माले नेता अजीत कुशवाहा के प्रभाव को भी इस जीत में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बताया जा रहा है कि चुनाव के दौरान महागठबंधन के कार्यकर्ता लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहे, जबकि जेडीयू के अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आते रहे।

राजपूत मतदाताओं की नाराजगी भी बनी फैक्टर 

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि इस चुनाव में राजपूत मतदाताओं की नाराजगी खुलकर सामने आई।

पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भी क्षेत्र में सवर्ण वोटों को लेकर असंतोष देखने को मिला था। उस समय आरोप लगे थे कि एनडीए के कुछ स्थानीय नेताओं ने अपेक्षित सहयोग नहीं किया।

उसी नाराजगी का असर इस उपचुनाव में भी दिखाई दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सवर्ण मतदाताओं के एक हिस्से की बेरुखी ने जेडीयू उम्मीदवार की स्थिति कमजोर कर दी।

RJD के लिए नई उम्मीद, JDU के लिए चेतावनी 

आरा-बक्सर सीट पर मिली जीत आरजेडी के लिए मनोबल बढ़ाने वाली मानी जा रही है। हाल के चुनावों में लगातार चुनौतियों का सामना कर रही पार्टी के लिए यह नतीजा नई उम्मीद लेकर आया है। 

वहीं जेडीयू के लिए यह हार एक बड़ा राजनीतिक संदेश मानी जा रही है। संगठनात्मक असंतोष, उम्मीदवार चयन और स्थानीय समीकरणों की अनदेखी पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हुई।

अब आने वाले विधानसभा और विधान परिषद चुनावों से पहले यह उपचुनाव बिहार की राजनीति में बड़े संकेत देता दिखाई दे रहा है।

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