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हिंदू-मुस्लिम और धर्म के जाल में फसी इंसानियत...

 07 Jun 2022

कोई राजपूत, कोई जाट, कोई योगी, मतलब हर कोई अपना सरनेम जोड़कर अपने-अपने सोशल मीडिया को चला रहे है, मतलब एक धर्म को मानते है और मैंने जहां तक पढ़ा है कि भारत देश एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है और इसी कड़ी में सब धर्म एक समान होते है।  

कमी भारत की अलग अलग जाति और धर्म में जन्म लेनी की नहीं है अपितु ये जब से बीजेपी ने हिंदू और हिंदुत्व का राग छेड़ा है तब से हो रहीं है। आज से पहले किसी ने इस पर अपनी बात क्यों नहीं रखी ? क्योंकि तब पता ही नहीं था कि धर्म क्या और जाति क्या है ! 

आप सब पढ़े लिखें तो होगें तो एक बात पर कभी ध्यान दिया है कि आपकी स्कूल और कॉलेज कैम्पस और आपकी कक्षा में किस धर्म के लोग ज्यादा थे। उस समय तो आप सब एक विद्यार्थी रहे होंगे तो सब ने एक साथ खाना भी खाया होगा, एक दूसरे की पारिवारिक विवाह और त्यौहार में भी शामिल हुए होंगे, तब ये हिंदू और मुस्लिम कहा था, जो अब बिना बात के ज्ञान बांट रहे है। 

आज के समय में ठेले वाले, करियाणा स्टोर वाले से दैनिक कार्य में प्रयोग होने वाला समान तो लेते होगें, तब आप धर्म क्यों नहीं पूछते? क्योंकि शायद आपको पता है कि ये मेरे से मेरे से ज्यादा कमाता है और अगर में इससे बहस करुंगा तो मुझे इस जैसे बहुत मिलेंगे।

आज के समय में हिंदू और मुस्लिम की नहीं राजनेताओं और उनके दिए गए पैसों की चलती है, और राजनेता आज के समय में किसी के नहीं होते मतलब जब वोट बैंक की जरूरत होती है तब तो घर पर आ जाते और वोट बैंक बनने के बाद कोई नहीं, चाहे आपका कोई काम कितना भी बड़ा हो या छोटा।

सारा राजनीति का खेल है, और देश को हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्र की नहीं, बल्कि बिज़नेस, नौकरी और पैसे की जरूरत है, परतु ये आपको शायद समझ नहीं आएगी और आप एक दिन नौकरी की तलाश करोगे और दूसरे दिन इसी भीड़ का एक भाग बनकर रह जाओगे। 

जाति धर्म बस एक मंच है, जिस पर एक कोई खेल सकता, इसलिए ये काम राजनीति पार्टियां करती है और देश की जनता का ध्यान भटकाने का काम करती है। हर एक हिंदू- मुस्लिम आपका भाई, बंधु, साथी, रिश्तेदार या पड़ोसी होता है। इसके बाबजूद आपको लगता है ये गलत है तो इसमें आपकी ही गलती है।

सब पहले भी मिलजुल कर रहते थे और अब कुछ बदलाव आया है तो ये कि  पहले गांव हुआ करते थे और अब शहर हो गए है। जिसमें इंसान की पहचान अपने माता और पिता और एक उस पड़ोसी के नाम से होती थी जो खून का रिश्ता न होते हुए भी इस रिश्ते को बनाए रखता था। 

 

पंक्तियां - प्रदीप सहारण की कलम से