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गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने असम सरकार को लगाई फटकार

 21 Apr 2026

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा के खिलाफ असम की मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां शर्मा द्वारा दर्ज एफआईआर के मामले में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने असम सरकार को कड़ी फटकार लगाई। खेड़ा ने सोमवार को उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विशेष रूप से अटॉर्नी जनरल (एजी) की गैरमौजूदगी पर नाराजगी जताई।


गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने लगाई फटकार

पवन खेड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी गुवाहाटी उच्च न्यायालय में पेश हुए। उन्होंने कोर्ट में असम सीएम के विवादित बयानों को रोकने की मांग की। उनके अनुसार, नोटिस के बावजूद मुख्यमंत्री ने ऐसे बयान जारी किए, जो कानूनी दृष्टि से सही नहीं थे। अदालत ने इस पर ध्यान देते हुए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई 28 मई के लिए तय की। जज ने यह भी कहा कि कम से कम जवाब तो दाखिल होना चाहिए था, जिससे कोर्ट में सही प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

पवन खेड़ा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गुवाहाटी हाईकोर्ट पहुंचे हैं, जहां असम राजनीतिक मामला भी चर्चा में रहा। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा दी गई सात दिनों की ‘ट्रांजिट’ अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी थी। इसके बाद खेड़ा की ओर से गुवाहाटी में यह याचिका दाखिल की गई, हालांकि इस दौरान हिमंता सरकार को फटकार लगाई जैसे हालात ने भी राजनीतिक बहस को तेज किया।

खेड़ा के आरोप 

पवन खेड़ा ने रिंकी भुइयां शर्मा पर कई विदेशी पासपोर्ट और अघोषित संपत्ति रखने का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि उनके पास संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), मिस्र और एंटीगुआ-बारबुडा के पासपोर्ट हैं। इसके साथ ही दुबई में दो संपत्तियां और फर्जी कंपनियों में संपत्ति होने का दावा किया।

गैर-जमानती वारंट असफल 

इसी बीच गुवाहाटी की एक अदालत ने कांग्रेस नेता के खिलाफ असम पुलिस द्वारा पेश गैर-जमानती वारंट की याचिका को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कामरूप मेट्रो ने कहा कि जांच अधिकारी द्वारा वारंट जारी करने के लिए दिए गए आधार केवल अनुमान और अटकलों पर आधारित हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड में कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है।

अगली सुनवाई 

अब इस मामले की अगली सुनवाई 28 मई को होगी। अदालत ने निर्देश दिए हैं कि हलफनामा समय पर दाखिल किया जाए। इस प्रक्रिया के दौरान असम सरकार को कोर्ट की चेतावनी को गंभीरता से लेना होगा।