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ईरान-इजराइल टकराव पर कांग्रेस में मतभेद, सरकार का समर्थन
21 Mar 2026
शशि थरूर का ईरान-इजराइल पर रुख: ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। इस भू-राजनीतिक संकट का असर अब आम लोगों तक भी पहुंचने लगा है। भारत में भी इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। खासकर कांग्रेस पार्टी के भीतर इस विषय पर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं, जिससे पार्टी की एकजुटता पर सवाल उठने लगे हैं।
एक ओर कांग्रेस लगातार नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना कर रही है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के वरिष्ठ नेता शशि थरूर और मनीष तिवारी सरकार के संतुलित और सावधानीपूर्ण रुख की सराहना कर रहे हैं। दोनों नेताओं का मानना है कि मौजूदा हालात में भारत को भावनात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय व्यावहारिक और रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ना चाहिए।
ईरान-इजराइल टकराव पर कांग्रेस में मतभेद
ईरान-इजराइल टकराव पर कांग्रेस में मतभेद के बीच मनीष तिवारी ने स्पष्ट रूप से कहा कि ईरान-इजराइल-अमेरिका के बीच चल रहा यह संघर्ष भारत का प्रत्यक्ष युद्ध नहीं है। ऐसे में भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए ही कोई भी कदम उठाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से ऊर्जा सुरक्षा, खाद आपूर्ति और विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का जिक्र किया।
तिवारी के अनुसार, रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ यही है कि देश अपने हितों की रक्षा करते हुए जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखे। उनका मानना है कि सरकार इस समय जिस सतर्कता से काम कर रही है, वह देश के हित में है और इससे आम जनता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सकता है।
चुप्पी कमजोरी नहीं, समझदारी है: शशि थरूर
ईरान-इजराइल टकराव पर कांग्रेस में मतभेद के बीच शशि थरूर ने कहा कि भारत का शांत और संयमित रुख किसी भी तरह की कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्व कूटनीति का संकेत है। उन्होंने कहा कि हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर मुखर होना जरूरी नहीं होता, कई बार संतुलन बनाए रखना ही सबसे बेहतर रणनीति होती है।
थरूर के अनुसार, अगर उन्हें किसी भी भारतीय सरकार को सलाह देनी होती, तो वे भी संयम बरतने की ही सलाह देते। उन्होंने इसे “संयम की शक्ति” बताते हुए कहा कि आज के जटिल वैश्विक माहौल में समझदारी से कदम उठाना ही असली बहादुरी है।
पार्टी के भीतर उभरे मतभेद
कांग्रेस जहां इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही थी, वहीं उसके ही कुछ वरिष्ठ नेताओं के अलग रुख ने पार्टी के भीतर मतभेदों को उजागर कर दिया है। यह पहली बार नहीं है जब शशि थरूर और मनीष तिवारी ने पार्टी लाइन से हटकर अपनी राय रखी हो।
इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कांग्रेस के भीतर भी एकमत नहीं है। फिलहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी इस आंतरिक असहमति को किस तरह संभालती है और आगे अपनी रणनीति क्या तय करती है।