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राहुल गांधी के पत्र पर विवाद, पूर्व अफसरों-जजों ने उठाये सवाल

 17 Mar 2026

सेवानिवृत्त सेना अधिकारी का पत्र - राहुल गांधी: देश के 204 पूर्व सैन्य अधिकारी, रिटायर्ड न्यायाधीश और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने नागरिकों के नाम एक पत्र जारी कर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और उनके कुछ सहयोगियों के हालिया संसद व्यवहार की कड़ी आलोचना की है। इस पत्र के समन्वयक जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने इसे लोकतंत्र और संसद की गरिमा के लिए चुनौती बताया।


राहुल गांधी के पत्र पर विवाद

राहुल गांधी के पत्र पर विवाद पत्र में बताया गया कि 12 मार्च को संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने, विशेषकर राहुल गांधी ने, स्पीकर के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना की। सांसदों ने संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय और बिस्कुट का सेवन किया, जिसे पत्र में अनुचित और असंसदीय आचरण बताया गया। पूर्व अधिकारियों का मानना है कि यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के मंदिर के प्रति घमंड और व्यक्तिगत विशेषाधिकार की भावना का प्रतीक है।

लोकतंत्र की गरिमा पर असर

राहुल गांधी के पत्र पर विवाद पत्र में यह भी कहा गया कि ऐसे आचरण न केवल संसद की कार्यवाही को बाधित करते हैं, बल्कि जनता के बहुमूल्य समय की बर्बादी करते हैं और लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाते हैं। एसपी वैद ने जोर देकर कहा कि यह घटना लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति लगातार अनादर की चेतावनी है, जो समय के साथ संसद की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक जीवन की नींव को कमजोर कर सकती है।

राहुल गांधी को माफी और आत्ममंथन करना चाहिए

पूर्व अधिकारियों और रिटायर्ड जजों ने स्पष्ट रूप से कहा कि राहुल गांधी को इस आचरण के लिए राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सांसदों को अपने व्यवहार पर आत्ममंथन करना चाहिए ताकि संसद की गरिमा, प्राधिकार और संस्थागत पवित्रता सुरक्षित रह सके।

जनता से अपील

एसपी वैद ने पत्र के माध्यम से आम जनता से भी अपील की कि वे ऐसे व्यवहार की निंदा करें और लोकतांत्रिक संस्थानों के सम्मान और सुरक्षा के प्रति सतर्क रहें। पत्र में यह चेतावनी भी दी गई कि यदि सांसद और अन्य प्रतिनिधि लगातार असंवैधानिक आचरण करते रहे, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है और जनता का विश्वास प्रभावित होगा।

इस खबर में साफ तौर पर यह संदेश दिया गया है कि संसद के भीतर अनुचित आचरण सिर्फ व्यक्तिगत गलती नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जिम्मेदारी और सम्मान का प्रश्न है।

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