अमेरिका और इजराइल के संयुक्त सैन्य अभियान के बाद पश्चिम एशिया में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। 28 फरवरी को ईरान पर बड़े पैमाने पर हमला किया गया और 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की टारगेटेड स्ट्राइक में मौत हो गई। इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत की ओर से आई प्रतिक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष का कहना है कि इस गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट पर सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। ईरान मुद्दे पर सोनिया गाँधी ने सरकार की चुप्पी को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया।
सोनिया गांधी ने उठाए सवाल
ईरान मुद्दे पर सोनिया गाँधी ने अपने लेख में कहा कि किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की इस तरह हत्या अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक परंपराओं के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि बातचीत जारी रहने के दौरान की गई यह कार्रवाई वैश्विक व्यवस्था में खतरनाक संकेत देती है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में केंद्र सरकार की चुप्पी तटस्थता नहीं बल्कि सिद्धांतों से पीछे हटने जैसा प्रतीत होती है। उनके मुताबिक, भारत को ईरान की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए था।
विदेश नीति और विश्वसनीयता पर असर
ईरान मुद्दे पर सोनिया गाँधी ने कहा कि जब कोई देश संप्रभुता के उल्लंघन पर आवाज नहीं उठाता, तो उसकी विदेश नीति की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ बल प्रयोग अंतरराष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध है। उनका कहना है कि ऐसे संवेदनशील समय में भारत की चुप्पी वैश्विक मंच पर गलत संदेश दे सकती है, खासकर तब जब भारत खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज बताता है।
ईरान से ऐतिहासिक रिश्तों का जिक्र
लेख में उन्होंने भारत और ईरान के लंबे सभ्यतागत और रणनीतिक संबंधों का भी उल्लेख किया। 1994 में कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर ईरान की भूमिका और 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तेहरान यात्रा का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते गहरे रहे हैं। ऐसे में, उनका तर्क है कि मौजूदा हालात पर भारत की चुप्पी और भी ज्यादा असहज करती है।
संसद में बहस की मांग
कांग्रेस ने ईरान पर हुए हमलों और टारगेटेड किलिंग की निंदा की है तथा इसे क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर गंभीर परिणाम वाला कदम बताया है। सोनिया गांधी ने कहा कि इस मुद्दे पर संसद में खुलकर चर्चा होनी चाहिए। उनके मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता के इस दौर में भारत को रणनीतिक स्पष्टता दिखानी चाहिए, क्योंकि लंबे समय तक बनी रहने वाली चुप्पी देश की नैतिक और कूटनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकती है।