Article
राज्यसभा की राह पर राजीव कुमार: टीएमसी का संदेश और सियासी हलचल
28 Feb 2026
TMC ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपने चार उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा Ex DGP Rajeev Kumar को लेकर है, जो इसी साल 31 जनवरी को सेवानिवृत्त हुए थे। 16 मार्च को होने वाले चुनाव में पश्चिम बंगाल की पांच सीटें खाली हो रही हैं और राजनीतिक गणित के मुताबिक चार सीटों पर टीएमसी की स्थिति मजबूत मानी जा रही है।
राजीव कुमार का नाम इसलिए चौंकाता है क्योंकि वे लंबे समय तक मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के भरोसेमंद अफसर माने जाते रहे हैं। पार्टी सूत्रों का मानना है कि यह फैसला केवल एक नामांकन नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश है जो अधिकारी कठिन समय में सरकार के साथ खड़े रहे, पार्टी उन्हें नजरअंदाज नहीं करती।
राजीव कुमार का नाम 2013 के Saradha chit fund scam के बाद सुर्खियों में आया था। उस समय उन्होंने एसटीएफ प्रमुख के तौर पर जांच की कमान संभाली और मुख्य आरोपी सुदीप्त सेन की गिरफ्तारी में भूमिका निभाई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मामला CBI को सौंप दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सीबीआई की कार्रवाई और उसके विरोध में कोलकाता के एस्प्लानेड में ममता बनर्जी का धरना राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा घटनाक्रम बना। उस दौर में टीएमसी के भीतर यह धारणा मजबूत हुई कि कुमार सरकार के लिए ‘संस्थागत ढाल’ की तरह खड़े रहे।
एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी के अनुसार, राजीव कुमार आतंकवाद-रोधी अभियानों और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के विशेषज्ञ माने जाते थे। कोलकाता पुलिस की एसटीएफ में रहते हुए उन्होंने कई बड़े अपराधियों की गिरफ्तारी और फर्जी नोट रैकेट के खिलाफ कार्रवाई में भूमिका निभाई।
टीएमसी ने अन्य तीन नाम भी घोषित किए हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री Babul Supriyo, जो अब टीएमसी में हैं, राज्यसभा भेजे जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता Menaka Guruswamy, जिन्होंने धारा 377 हटाने से जुड़े ऐतिहासिक मामले में भूमिका निभाई थी, और बंगाली फिल्म जगत की चर्चित अभिनेत्री Koel Mallick को भी उम्मीदवार बनाया गया है।
विपक्ष ने इस फैसले की तीखी आलोचना की है।BJP ने इसे राजनीतिक इनाम करार दिया, जबकि Communist Party of India (Marxist) नेताओं ने प्रशासन के राजनीतिकरण का आरोप लगाया।
2 अप्रैल को सीटें खाली होने के साथ ही राज्यसभा में नई पारी शुरू होगी। ऐसे में राजीव कुमार की एंट्री को सिर्फ संसदीय नियुक्ति नहीं, बल्कि बंगाल की सियासत में एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है जहां वफादारी, संदेश और चुनावी रणनीति तीनों एक साथ नजर आते हैं।