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प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा को भूराजनीतिक चुनौतियों का सामना।

 25 Feb 2026

प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा: विस्तृत विश्लेषण और रणनीतिक महत्व


प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा 25-26 फरवरी 2026 को दो-दिवसीय राजकीय यात्रा के रूप में हो रही है, जो भारत के लिए रणनीतिक और भूराजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील समय पर आयोजित की जा रही है। 

यह इजराइल की राजकीय यात्रा उनकी दूसरी यात्रा है और दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के साथ ही वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने का अवसर भी प्रदान करती है। इस यात्रा के दौरान भारत और इजराइल के बीच रक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हो रही है, और साथ ही मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत भी जारी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह यात्रा विशिष्ट रणनीतिक संतुलन का प्रतीक है क्योंकि भारत पश्चिम एशिया में ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग, और वैश्विक आर्थिक साझेदारी के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बना रहा है। इस दौरे को लेकर भूराजनीतिक चुनौतियाँ, जैसे पश्चिम एशिया में तनाव, इजराइल-ईरान संघर्ष, तथा भारत-पाकिस्तान के परस्पर हित भी प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही, इजराइल में बढ़ रही घरेलू राजनीतिक जटिलताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो यात्रा की रणनीति को प्रभावित कर सकती हैं।

इस यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी नेसेट (इजरायली संसद) को संबोधित करेंगे — ऐसा कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री इससे पहले कभी नहीं कर पाया है। यह कदम भारत-इजराइल संबंधों की मजबूती को दर्शाता है और वैश्विक मंच पर भारत की राजनीतिक साख को और मजबूती प्रदान करता है।

भूराजनीतिक चुनौतियाँ और विदेश नीति की पेचीदगियाँ


भूराजनीतिक चुनौतियों की बात करें तो यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया की राजनीति काफी अस्थिर है। इजराइल और ईरान के बीच चल रहा तनाव, गाजा संघर्ष, और इजरायल की वेस्ट बैंक नीति का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध ध्यान आकर्षित कर रहा है। 

कई देशों के दृष्टिकोणों में अंतर के कारण भारत को अपने विदेशी नीति संतुलन को और सतर्कता से संभालना पड़ रहा है। विशेष रूप से भारत पुराने समय से फलीस्तीन-समर्थक रुख रखता आया है, जबकि इजराइल के साथ रक्षा और तकनीकी साझेदारी मजबूत कर रहा है। इस संतुलन को बनाए रखना एक बड़ी भूराजनीतिक चुनौती है।

भारत और इजराइल दोनों ही आतंकवाद के खिलाफ शून्य-सहनशीलता (zero tolerance) नीति की बात कर रहे हैं और आतंकवाद नेटवर्क के उभार से मुकाबला करने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। यह साझेदारी आतंकवाद के बढ़ते रूपों—जैसे ड्रोन उपयोग और साइबर खतरों—के खिलाफ साझा प्रतिक्रिया को मजबूत कर सकती है। हालांकि, यह सहयोग उन चुनौतियों को भी जन्म देता है जिनका समाधान केवल द्विपक्षीय प्रयासों से संभव नहीं होता, बल्कि बहुपक्षीय मंचों पर भी आवश्यक है।

भूराजनीतिक समीकरणों में एक और चुनौती यह है कि कई मध्य-पूर्वी और अन्य दक्षिण और पश्चिम एशियाई देश भारत-इजराइल संबंधों की बढ़ती निकटता को ध्यान से देख रहे हैं। यह संतुलन पश्चिम एशियाई ऊर्जा साझेदारों, जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान, के साथ भारत की पारंपरिक नीतियों पर प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि भारत दोनों समूहों के साथ अपने संबंधों को समृद्ध रखना चाहता है। इन सारे आयामों में कलात्मक संतुलन बनाना प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।

रणनीतिक और आर्थिक अवसर: द्विपक्षीय सहयोग


जहाँ भूराजनीतिक चुनौतियाँ महत्वपूर्ण हैं, वहीं रणनीतिक और आर्थिक अवसरों की संभावनाएँ भी बराबर हैं। भारत और इजराइल पहले ही रक्षा और टैक्नोलॉजी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण साझेदारी स्थापित कर चुके हैं। इस यात्रा के दौरान रक्षा, एआई, कृषि, जल प्रबंधन और व्यापार के क्षेत्रों पर और अधिक समझौते किए जा सकते हैं, जिससे दोनों देशों को आपसी सहयोग के नए अवसर मिल सकते हैं।

इसके अलावा, भारत-इजराइल मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की पहली दौर की वार्ता यात्रा से ठीक पहले शुरू हो चुकी है, जो कि दोनों देशों के आर्थिक और व्यावसायिक सहयोग को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का संकेत है। यह कदम प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा की रणनीतिक रूपरेखा को एक मजबूत आर्थिक आयाम प्रदान करता है।

इजरायल के साथ रक्षा सहयोग को और मजबूत करने के लिए भारत संभावित रूप से उच्च-ऊर्जा लेजर सिस्टम, उन्नत ड्रोन तकनीक और लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों जैसी अत्याधुनिक प्रणालियों पर भी समझौतों पर काम कर सकता है, जो दोनों देशों की सुरक्षा प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण साबित होंगे। यह साझेदारी भारत की रक्षा क्षमताओं को और समृद्ध कर सकती है।

प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा दुर्व्यवहार की आशंका के साथ ही एक अवसर भी प्रदान कर रही है कि भारत मध्य-पूर्व की राजनीति में एक संतुलित और सक्रिय भागीदार के रूप में अपनी भूमिका को दृढ़ता से व्यक्त करे। आज की वैश्विक राजनीति में इस तरह की संतुलनकारी भूमिका से देश को आर्थिक और सुरक्षा दोनों क्षेत्रों में लाभ हो सकता है, बशर्ते विदेश नीति में सावधानी और स्पष्टता दोनों ही बनी रहें।