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10 वर्षों में भारत में 93000 स्कूल बंद: शिक्षा पर बढ़ी चिंता

 21 Feb 2026

पिछले दस वर्षों में भारत में 93000 स्कूल बंद होने का मामला अब केवल एक सांख्यिकी तथ्य नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की दिशा पर गंभीर सवाल बनकर उभरा है। हाल ही में संसद में पेश किए गए आधिकारिक आकड़ों के मुताबिक 2014-15 से 2024 के बीच बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल या तो पूरी तरह बंद कर दिए गए या उन्हें अन्य स्कूलों में मिल दिया गया। सबसे अधिक प्रभाव उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्यों में देखा गया। जहां हजारों विद्यालय शिक्षा मानचित्र से गायब हो गए।

93000 स्कूलों के बंद होने से सवालों के घेरे में सरकार


सरकार का तर्क है कि भारत में 93000 स्कूल बंद होने के पीछे छात्रों की घटती संख्या, स्कूलों का आपसी विलय और संसाधनों का पुनर्गठन जैसे कारण हैं। कई ग्रामीण इलाकों में कम नामांकन वाले स्कूलों को नजदीकी बड़े संस्थानों में मिला दिया गया। आधिकारिक भाषा में इसे तर्कसंगत पुनर्संरचना कहा गया है। लेकिन जमीनी स्तर पर इसका मतलब अक्सर यह होता है कि बच्चों को अब पहले से अधिक दूरी तय कर स्कूल पहुंचना पड़ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों की संख्या में गिरावट का सीधा असर गरीब और वंचित समुदायों पर पड़ता है। जिन परिवारों के पास निजी स्कूलों का खर्च उठाने की क्षमता नहीं है, उनके लिए नजदीकी सरकारी स्कूल ही एकमात्र विकल्प होते हैं। ऐसे में स्कूल बंद होना सिर्फ एक भवन का ताला लगाना नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई के रास्ते का संकरा होना है। खासकर प्राथमिक स्तर पर विद्यालयों की उपलब्धता कम होने से लड़कियों की शिक्षा प्रभावित होने की आशंका अधिक रहती है।

क्या निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिल रहा है ?


इस बीच कुछ रिपोर्टों में ऐसे स्कूलों का भी जिक्र है जहां नामांकन शून्य के करीब पहुँच गया था। यह सवाल भी उठता है कि क्या समस्या केवल कम छात्रों की है, या फिर शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने लोगों का भरोसा कमजोर किया है।

कुल मिलाकर, भारत में 93000 स्कूल बंद होना एक प्रशासनिक निर्णय भर नहीं दिखता। यह उस बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है जहां सरकारी शिक्षा तंत्र सिमट रहा है और निजी क्षेत्र का दायरा बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में यह देखना अहम होगा कि यह प्रवृति शिक्षा की पहुँच को मजबूत करती है या असमानता को गहरा।