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गोरखपुर दहेज और बेटेकी चाहत में हैवानियत, एक साल की मासूम बच्ची को जमीन पर पटका
02 Feb 2026
गोरखपुर में घरेलू हिंसा का खौफनाक मामला
गोरखपुर में घरेलू हिंसा का यह खौफनाक मामला हमें फिर याद दिलाता है कि अपराध हमेशा अंधेरी गलियों में नहीं होते, कई बार वे घर की चार दीवारों के भीतर होते हैं। एक महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष के छह अन्य लोगों पर दहेज के लिए प्रताड़ना और बच्चों के साथ क्रूर हिंसा के गंभीर आरोप लगाए हैं। FIR के मुताबिक, महिला की शादी वर्ष 2020 में हुई थी। चार साल के भीतर उसकी दो बेटियां हुईं—एक की उम्र चार साल और दूसरी महज डेढ़ साल की है। गोरखपुर में घरेलू हिंसा की यह दास्तान तब और डरावनी हो जाती है जब एक माँ पुलिस को बताती है कि उसके पति ने अपनी ही दुधमुँही बच्ची को जमीन पर पटक दिया, जिससे मासूम का शरीर अब ठीक से काम नहीं कर पा रहा है।
दहेज के लिए प्रताड़ना और लगातार हिंसा का आरोप
महिला का कहना है कि शादी के बाद से ही दहेज को लेकर उस पर दबाव बनाया जाने लगा। मांग पूरी न होने पर मारपीट, गालियाँ और धमकियाँ आम बात बन गईं। लेकिन इस मामले को सबसे ज़्यादा डरावना बनाती है वह बात, जो एक मां ने पुलिस को बताई। करीब दो-तीन महीने पहले उसके पति ने उसकी छोटी बच्ची को ज़मीन पर पटक दिया। बच्ची उस वक्त बोल भी नहीं सकती थी। महिला का दावा है कि इस घटना के बाद बच्ची के शरीर का निचला हिस्सा ठीक से काम नहीं कर पा रहा है और उसका इलाज चल रहा है।
FIR दर्ज, लेकिन कार्रवाई पर सवाल
FIR में दर्ज है कि 28 जनवरी 2026 को महिला और उसकी दोनों बेटियों के साथ फिर से बेरहमी से मारपीट की गई और बाद में उन्हें घर से बाहर निकाल दिया गया। शिकायत के बाद पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया है, लेकिन पीड़िता का आरोप है कि FIR के बावजूद अब तक आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। गोरखपुर में घरेलू हिंसा के इस मामले में आरोपी आज भी खुलेआम घूम रहे हैं, जिसके कारण पीड़िता और उसके बच्चे अभी भी खौफ के साये में जीने को मजबूर हैं।
सिस्टम पर सवाल और बच्चों की सुरक्षा का मुद्दा
यह सिर्फ एक ऐसा मामला नहीं है। यह उस सिस्टम का आईना है, जहाँ एक मां को अपनी बच्ची की चोटें दिखाकर भी यह साबित करना पड़ता है कि उसके साथ सच में कुछ गलत हुआ है, इसके बाद भी कार्यवाई नहीं कि जाती है। सवाल यह है कि जब बच्चे तक सुरक्षित नहीं हैं, तो हम किस समाज की बात कर रहे हैं? और ऐसे कितने मामले होंगे, जो रिपोर्ट ही नहीं हो पाते होंगे? यह मामला हमें फिर उसी सवाल पर ले जाता है, जिसे हम हर बार सुनकर आगे बढ़ जाते हैं। भारत में दहेज कानून है, घरेलू हिंसा कानून है, बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून है। और इसके बाद भी अगर कार्रवाई नहीं होती, तो कानून किसके लिए है?
समझौते से इनकार, सिर्फ न्याय की मांग
पीड़िता का साफ़ तौर पर ये कहना है कि अब वह किसी भी तरह के समझौते के पक्ष में नहीं है। उसका दर्द बयां करता है कि उसने मर्यादा और परिवार के नाम पर बहुत कुछ सह लिया है, पिता के न होने कि वजह से वह अपनी माँ को अपने साथ हो रहे दुर्व्यहवार के बारे में न बता सकी। अब उसकी लड़ाई खुद के लिए नहीं, बल्कि अपनी बेटियों के भविष्य और उनके हक के लिए है। गोरखपुर में घरेलू हिंसा की शिकार यह माँ आज व्यवस्था से सिर्फ न्याय की गुहार लगा रही है। यह मांग कोई बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन सवाल बस इतना है कि क्या हमारा सिस्टम एक बेबस माँ की इस पुकार को सुन पाएगा या नहीं? क्या आज के दौर में भी एक महिला के लिए इंसाफ की राह इतनी मुश्किल होनी चाहिए?
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