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कुमार विश्वास यूजीसी नियम पर कटाक्ष, ‘अभागा सवर्ण’ बयान

 28 Jan 2026

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियमों को लेकर देशभर में असहमति की आवाज़ें लगातार तेज़ हो रही हैं। छात्र, शिक्षक और अकादमिक जगत का एक बड़ा वर्ग इन बदलावों को लेकर सवाल उठा रहा है। इसी क्रम में प्रसिद्ध कवि और वक्ता कुमार विश्वास ने फेसबुक पर एक पोस्ट साझा कर व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया है। उन्होंने खुद को “अभागा सवर्ण” बताते हुए मौजूदा शिक्षा नीति और सामाजिक विमर्श पर कटाक्ष किया, जिससे बहस को नया मोड़ मिल गया।

UGC पर बवाल


कुमार विश्वास की पोस्ट सिर्फ़ एक व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि उसमें व्यवस्था के प्रति गहरी नाराज़गी झलकती है। उन्होंने संकेत दिया कि आज योग्यता और अनुभव से अधिक पहचान और वर्ग को महत्व दिया जा रहा है। उनका यह बयान सीधे तौर पर कुमार विश्वास यूजीसी नियम से जुड़े विवाद के संदर्भ में देखा जा रहा है, जहां कई लोगों को लगता है कि नई नीतियां शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटक रही हैं।

UGC के हालिया नियमों पर यह आरोप लग रहे हैं कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है और नियुक्ति प्रक्रिया अधिक केंद्रीकृत होती जा रही है। कुमार विश्वास ने अपने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में यह सवाल उठाया कि क्या शिक्षा संस्थान अब स्वतंत्र विचार और बौद्धिक विविधता के केंद्र रह पाएंगे। कुमार विश्वास यूजीसी नियम पर उनकी टिप्पणी ने इस चिंता को सार्वजनिक मंच पर और मुखर कर दिया।

सोशल मीडिया पर तंज


सोशल मीडिया पर उनकी पोस्ट के बाद प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। समर्थकों का मानना है कि कुमार विश्वास ने उस असहज सच्चाई को सामने रखा है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। उनके अनुसार, यह बयान किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया पर सवाल है। वहीं आलोचकों का कहना है कि कुमार विश्वास यूजीसी नियम जैसे गंभीर मुद्दे को जातिगत पहचान से जोड़ना बहस को भटका सकता है और समाधान की बजाय ध्रुवीकरण बढ़ा सकता है।

शिक्षा व्यवस्था पर सवाल क्यों?


यह पहली बार नहीं है जब कुमार विश्वास ने शिक्षा या सामाजिक नीतियों पर खुलकर अपनी राय रखी हो। वह पहले भी कई मुद्दों पर सत्ता और व्यवस्था से असहमति जताते रहे हैं। इस बार उनका बयान एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या शिक्षा सुधार वास्तव में समावेशी और संतुलित हैं। कुमार विश्वास यूजीसी नियम को लेकर उठी यह बहस केवल एक पोस्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक असंतोष को दर्शाती है जो आज देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर मौजूद है।

अंत में, यह विवाद इस बात की ओर इशारा करता है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में लिए गए फैसलों पर संवाद और पारदर्शिता कितनी आवश्यक है। कुमार विश्वास की टिप्पणी चाहे सहमति या असहमति पैदा करे, लेकिन उसने एक ज़रूरी बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है।