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दक्षिण कोरिया पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ाकर 25% कर दिया गया है।

 27 Jan 2026

दक्षिण कोरिया पर अमेरिकी टैरिफ वृद्धि — क्या है वजह?


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार, 26 जनवरी 2026 को दक्षिण कोरिया पर अमेरिकी टैरिफ दरों को 15% से बढ़ाकर 25% करने की घोषणा की, जिससे दुनिया भर के व्यापारिक माहौल में एक नया विवाद उत्पन्न हुआ है। ट्रंप ने इस कदम को दक्षिण कोरिया की संसद द्वारा पिछले वर्ष अमेरिका के साथ किए गए ऐतिहासिक व्यापार समझौते को पारित न करने के कारण उठाया गया बताया है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि कोरियाई लॉयमेकर उस समझौते को लागू नहीं कर रहे हैं, जिससे अमेरिका ने अपने पक्ष में दिये पूर्व समझौतों का लाभ नहीं पा रहा है।

इस घोषणा के अनुसार, यह टैरिफ वृद्धि ऑटोमोबाइल, लकड़ी, दवाइयां और अन्य कई माल पर लागू होगी, जो अमेरिका में दक्षिण कोरिया से बड़ी मात्रा में आयात होते हैं। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह कदम अमेरिका-दक्षिण कोरिया व्यापार संतुलन को स्थिर करने के लिये जरूरी है, क्योंकि समझौते के तहत अमेरिकी तरफ से पहले से टैरिफ कम करने के बड़े वादे किये गए थे।

ट्रंप ने दक्षिण कोरिया की संसद पर यह आरोप भी लगाया कि उन्होंने उस समझौते को संसद के दोनों सदनों में पेश नहीं किया और न ही समय पर स्वीकृति दी, जिससे अमेरिका को समझौते के फायदे नहीं मिल रहे। हालांकि, दक्षिण कोरियाई सरकार ने कहा कि उन्हें इस टैरिफ निर्णय की पूर्व सूचना नहीं दी गई थी, और वह जल्द ही अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के लिये तैयार हैं।

व्यापार और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव


दक्षिण कोरिया पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ाने के फैसले का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव दोनों देशों के व्यापार तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर देखा जा रहा है। उच्च टैरिफ दरें दक्षिण कोरियाई उत्पादों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित कर सकती हैं, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल और फार्मास्यूटिकल्‍स जैसे प्रमुख सेगमेंटों में। अनुमान है कि मोटर वाहन निर्माता हुंडई और किआ जैसी कंपनियाँ जो अमेरिकी बाजार में बड़ी मात्रा में निर्यात करती हैं, उन्हें लागत में वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है और यह लागत अंततः उपभोक्ताओं तक भी जा सकती है।

बाज़ार प्रतिक्रिया में भी तेजी से गिरावट और उतार-चढ़ाव देखने को मिला। दक्षिण कोरियाई शेयर बाज़ार में कंपनियों के स्टॉक्स में शुरुआती गिरावट दर्ज की गयी, हालांकि बाद में कुछ हद तक रिकवरी भी हुई। दक्षिण कोरियाई वहन (Won) डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई, जिससे विदेशी मुद्रा बाजारों में भी अस्थिरता आई।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस तरह के टैरिफ कदम से दो देशों के बीच लंबे समय तक व्यापारिक रिश्तों को नुकसान पहुँच सकता है और यह वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में बाधाएँ उत्पन्न कर सकता है। खासकर जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में पहले से उधारी लागतें और महंगाई के दबाव हैं, ऐसे में टैरिफ दरों में वृद्धि से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है।

अमेरिका का यह निर्णय उन व्यापारिक नीतियों का भी हिस्सा है जिनमें ट्रंप प्रशासन आयात घाटे को नियंत्रित करने और स्थानीय उद्योगों को समर्थन देने के लिये टैरिफ का उपयोग कर रहा है। हालांकि, इससे गहरी आर्थिक चुनौतियाँ और प्रतिकूल प्रभावों के सवाल भी उठते हैं, जिनका सामना दोनों सहयोगी देशों को करना पड़ सकता है।

कूटनीति, वैश्विक परिदृश्य और रणनीतिक प्रतिक्रियाएँ


यह निर्णय केवल आर्थिक नहीं बल्कि कूटनीतिक लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। दक्षिण कोरिया अमेरिका का एक प्रमुख रणनीतिक और सुरक्षा सहयोगी रहा है, विशेषकर उत्तर कोरिया के बढ़ते सुरक्षा संकट के बीच। इसलिए दक्षिण कोरिया पर अमेरिकी टैरिफ की यह वृद्धि न केवल व्यापारिक मसला बन गई है बल्कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक वार्ता और साझेदारी के स्वरूप को भी प्रभावित कर सकती है।

चीन तथा अन्य वैश्विक विश्लेषकों ने इस कदम की आलोचना की है, यह कहकर कि इससे अमेरिका के सहयोगियों के साथ विश्वास और सहयोग में गिरावट आ सकती है। कुछ टिप्पणीकारों ने इसे अमेरिका की विदेश नीति में एक “दबाव रणनीति” के रूप में देखा है, जो व्यापार समझौतों को लागू करने के लिये समर्थन को हथियार की तरह उपयोग कर रहा है और इससे वैश्विक व्यापार नियमों और संबंधों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है।

दक्षिण कोरिया ने अभी तक इस टैरिफ निर्णय को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है और उसने कहा है कि वह जल्द ही अमेरिकी अधिकारियों से “दो-तरफ़ा वार्ता” करेगा। इस बातचीत का उद्देश्य व्यापार समझौते के निष्पादन के लिये तालमेल स्थापित करना तथा व्यापारिक तनाव को कम करना माना जा रहा है।

वैश्विक स्तर पर इस कदम को कुछ विश्लेषकों ने त्रिकोणीय व्यापार तनाव के हिस्से के रूप में देखा है, जिसमें अमेरिका अन्य व्यापारिक साझेदारों जैसे यूरोपीय संघ, कनाडा और जापान के साथ भी टैरिफ नीतियों को लेकर संघर्ष कर रहा है। यह संकेत देता है कि वैश्विक व्यापार नीति में संरक्षणवादी रुख और द्विपक्षीय टकरावों की संभावनाएँ बढ़ रही हैं, जिनका समाना आने वाले समय में दुनिया भर के बाज़ारों और साझेदार देशों को करना पड़ेगा।