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ग्रीनलैंड विवाद में ट्रंप की टैरिफ धमकी पर बड़ा यू-टर्न।
22 Jan 2026
2026 की शुरुआत में दुनिया की अंतरराष्ट्रीय खबरों में ट्रंप की टैरिफ धमकी शीर्ष विषयों में से एक रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय देशों के खिलाफ ग्रीनलैंड के मुद्दे पर कड़े व्यापारिक कदमों की चेतावनी दी थी, लेकिन बाद में उसी धमकी को वापस ले लिया। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि ट्रंप ने ऐसा क्यों किया, यूरोपीय देशों ने कैसे प्रतिक्रिया दी और इसका वैश्विक स्तर पर क्या प्रभाव पड़ा।
ट्रंप की टैरिफ धमकी: क्या थी धमकी और क्यों आया यू-टर्न?
ट्रंप की टैरिफ धमकीt की शुरुआत अमेरिका और यूरोप के बीच ग्रीनलैंड को लेकर राजनीतिक तनाव के रूप में हुई। ट्रंप ने उन आठ यूरोपीय देशों — जिनमें डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, यूके, नॉर्डिक देशों सहित अन्य नाटो सहयोगी राष्ट्र शामिल थे — को चेताया कि अगर वे ग्रीनलैंड के संबंध में अमेरिकी हितों को मान्यता नहीं देंगे, तो उन पर 1 फरवरी से टैरिफ यानी अतिरिक्त आयात शुल्क लग सकते हैं।
ग्रीनलैंड मूल रूप से डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और यह रणनीतिक रूप से आर्कटिक में स्थित है, जहाँ चीन और रूस की बढ़ती सैन्य और आर्थिक गतिविधियाँ अमेरिका को चिंतित कर रही थीं। ट्रंप ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला बताया और कहा कि अमेरिका को इस क्षेत्र का नियंत्रण हासिल करना चाहिए।
लेकिन भारी अंतरराष्ट्रीय और व्यापारिक प्रतिक्रिया के मध्य, ट्रंप ने 21 जनवरी को अचानक घोषणा की कि वह टैरिफ धमकी को वापस ले रहे हैं। इसके पीछे उन्होंने एक संभावित “फ्यूचर डील फ्रेमवर्क” (भविष्य के समझौते का ढांचा) का हवाला दिया, जो नाटो सचिव जनरल मार्क रुटे के साथ बातचीत के बाद तय हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल कोई कड़े व्यापार प्रतिबंध लागू नहीं होंगे और सैन्य विकल्प भी इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
यूरोपीय देशों और वैश्विक प्रतिक्रिया: सहयोग, आलोचना और संतुलन
ट्रंप की टैरिफ धमकी की घोषणा के बाद यूरोपीय नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। कई देशों ने कहा कि वे धमकियों से प्रभावित नहीं होंगे और अपने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितों के पक्ष में खड़े रहेंगे। यूरोपीय संसद ने संयुक्त व्यापार समझौते की मंजूरी को रोक दिया और संयुक्त बयान जारी किया कि किसी भी धमकी को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
डेनमार्क, जो ग्रीनलैंड का संरक्षक राज्य है, ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड बिकने वाला नहीं है। उसके नेता ने कहा कि उनके पास अपनी संप्रभुता तय करने का अधिकार है और किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा। फ्रांस, जर्मनी और यूके जैसे देश भी संयुक्त रूप से अमेरिका के रुख का विरोध कर रहे थे।
वैश्विक मीडिया मंचों पर भी इस मुद्दे ने व्यापक हलचल मचाई। कुछ विश्लेषकों ने कहा कि ट्रंप के फैसले से अंतरराष्ट्रीय व्यापार तंत्र और समझौतों पर पुनर्विचार करना पड़ेगा, जबकि अन्य ने इसे राजनीतिक सामंजस्य का उदाहरण बताया। ट्रंप के यू-टर्न से वैश्विक बाजारों में स्थिरता का संकेत भी मिलने लगा।
आगे क्या? रणनीति, सम्भावित समझौते और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
अब जब ट्रंप नेटैरिफ धमकी को वापस ले लिया है और एक ढांचे पर समझौते का संकेत दिया है, तो सवाल यह उठता है कि आगे क्या होगा। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकता अब खुली बातचीत और रणनीतिक भागीदारी की ओर है, बजाय कड़े दबाव और टैक्स बढ़ाने के।
विश्लेषकों की मानें तो यह कदम आर्थिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। यूरोपीय व्यापार बाजार और संयुक्त रणनीतियाँ पहले ही अस्थिरता का सामना कर रही थीं, और अगर अमेरिका ने कड़े टैरिफ लागू कर दिए होते, तो व्यापक ट्रेड वॉर की संभावना थी।
अब जबकि ट्रंप की टैरिफ धमकी वापसी के बाद स्थितियां स्थिर होती दिख रही हैं, वैश्विक कंपनियों, निवेशकों और नीतिनिर्माताओं को यह देखने की जरूरत होगी कि क्या वाकई में ग्रीनलैंड के मुद्दे पर कोई ठोस समझौता होता है, या यह सिर्फ एक अस्थायी शांति का संकेत है। आर्थिक विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि सभी पक्षों को पारदर्शिता और कूटनीतिक बातचीत को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिससे व्यापार और सुरक्षा दोनों की बुनियाद मजबूत रहे।