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अमेरिका की ग्रीनलैंड हासिल करने की योजना से बढ़ी वैश्विक हलचल।
07 Jan 2026
‘अमेरिका की ग्रीनलैंड हासिल करने की योजना’— नई भू-राजनीतिक चाल या रणनीतिक कदम?
हाल ही में अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज़ हो गई है कि अमेरिका की ग्रीनलैंड हासिल करने की योजना यानी अमेरिका ग्रीनलैंड को अपने अधिकार में लेने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। व्हाइट हाउस से जुड़े सूत्रों के अनुसार, यह विचार नया नहीं है—पूर्व में भी अमेरिकी प्रशासन ने इस दिशा में रुचि दिखाई थी, लेकिन अब बदलते वैश्विक हालात, जलवायु परिवर्तन और आर्कटिक क्षेत्र की बढ़ती सामरिक अहमियत के कारण यह मुद्दा दोबारा उभर आया है।
ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, न केवल प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है बल्कि आर्कटिक सर्कल में अपनी सामरिक स्थिति के कारण अमेरिका, रूस और चीन जैसे महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि भविष्य में आर्कटिक के पिघलने से नए समुद्री मार्ग खुलेंगे, जिनसे व्यापार और सैन्य दृष्टि से इस क्षेत्र की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी।
सैन्य और आर्थिक दृष्टिकोण से ग्रीनलैंड क्यों अहम है
अमेरिका की ग्रीनलैंड हासिल करने की योजना—सिर्फ राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं बल्कि एक गहरी सैन्य-रणनीतिक सोच का हिस्सा मानी जा रही है। ग्रीनलैंड में अमेरिकी वायुसेना पहले से ही थुले एयर बेस (Thule Air Base) संचालित करती है, जो रूस और यूरोप के बीच स्थित है। यह बेस न केवल निगरानी के लिहाज़ से बल्कि मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए भी बेहद अहम माना जाता है।
इसके अलावा, ग्रीनलैंड में बड़ी मात्रा में दुर्लभ खनिज (rare earth minerals) पाए जाते हैं, जो भविष्य की तकनीक जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा और सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए आवश्यक हैं। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि चीन की इस क्षेत्र में बढ़ती दखल को रोकने के लिए ग्रीनलैंड पर प्रभाव बढ़ाना रणनीतिक रूप से ज़रूरी है।
डेनमार्क ने हालांकि इस विचार को सिरे से खारिज किया है। उसके मुताबिक, ग्रीनलैंड की अपनी स्वायत्त सरकार है और इस तरह की कोई भी ‘खरीद-बिक्री’ संप्रभुता का उल्लंघन मानी जाएगी। फिर भी, अमेरिकी कूटनीति लगातार इस दिशा में अप्रत्यक्ष दबाव बनाए हुए है।
भविष्य की दिशा: क्या ग्रीनलैंड नया भू-राजनीतिक मोर्चा बनेगा?
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ संपत्ति अधिग्रहण का नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन का हिस्सा है। आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ़ के पिघलने से तेल, गैस और खनिजों तक पहुंच आसान हो रही है। अमेरिका नहीं चाहता कि रूस या चीन इस क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त हासिल करें। ऐसे में अमेरिका की ग्रीनलैंड हासिल करने की योजना जैसी रणनीति, वाशिंगटन के लिए एक दीर्घकालिक योजना का रूप ले सकती है।
ग्रीनलैंड सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी स्वायत्तता और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करेगी। वहीं डेनमार्क का कहना है कि अमेरिका का कोई भी कदम अंतरराष्ट्रीय कानून और आर्कटिक समझौतों के दायरे में होना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में आर्कटिक क्षेत्र एक नए “शीत युद्ध” का केंद्र बन सकता है—जहाँ बर्फ़ के नीचे छिपे संसाधन और सैन्य ठिकाने अगली सदी के ऊर्जा और सुरक्षा समीकरण तय करेंगे।