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इंदौर जल संकट पर सियासी जंग: कांग्रेस-भाजपा आमने-सामने

 05 Jan 2026

देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर जल संकट से अब तक 16 लोगों की मौत और एक हजार से अधिक लोगों के बीमार होने की खबर आयी है। इसके बावजूद सात दिन बाद भी नगर निगम भागीरथपुरा क्षेत्र में साफ पानी उपलब्ध करवाने में नाकाम कोशिश हो रही है। शनिवार को उल्टी दस्त के 65 नए मरीज मिले हैं। जिसमें 15 को अस्पतालों में भर्ती किया गया और बाकी लोगों को घर भेजा गया। वर्तमान में 149 मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं जिनमें 20 आईसीयू में हैं। इस बीच गरमाई सियासी टकराव प्रशासनिक विफलता उजागर करता है।

इंदौर जल संकट में कांग्रेस-भाजपा टकराव


इंदौर के बीच भागीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल से फैले उल्टी-दस्त के प्रकोप के बाद सियासत तेज हो गई है। युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने शुक्रवार को इंदौर नगर निगम के बाहर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें वे अपने साथ एक बड़ी घंटी लेकर आए थे। जो दूषित पानी की त्रासदी पर उनकी असंतोष का प्रतीक थी। यह विरोध प्रदर्शन भागीरथपुरा क्षेत्र में हुई कई मौतों के बारे में स्थानीय पीड़ितों की शिकायतों के बाद शुरू हुआ, जिनका आरोप सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तहत प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण लगाया गया है।

काले झंडे, नारेबाजी और हाथापाई के बाद हालात तनावपूर्ण


पीड़ित परिवारों से मिलने पहुँची कांग्रेस की जांच समिति और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच टकराव हो गया। काले झंडे, ‘वापस जाओ-वापस जाओ’ की नारेबाजी और हाथापाई के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए, जिसके चलते पुलिस ने शनिवार को 10 महिलाओं सहित 45 कांग्रेस नेताओं-कार्यकर्ताओं को एहतियातन गिरफ्तार किया। बाद में सभी को मुचलके पर रिहा कर दिया गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा के दबाव में पुलिस ने उन्हें पीड़ितों से मिलने से रोका, जबकि भाजपा ने कांग्रेस को इंदौर दूषित जल संकट पर राजनीति करने का आरोप लगाया। यह घटना एक विवादास्पद घटनाक्रम के बाद घटी, जिसमें राज्य के एक वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने नगरपालिका जल समस्या पर मीडिया के सवालों को उपहासपूर्वक खारिज कर दिया था।

इंदौर प्रशासन का दावा: गंदे पानी से सिर्फ़ 6 लोगों की मौत


जबलपुर हाई कोर्ट में शुक्रवार को अधीक्षण मंत्री संजीव श्रीवास्तव ने जो स्टेटस रिपोर्ट पेश की है, उसके मुताबिक इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से सिर्फ 6 लोगों की मौत डायरिया से हुई है। जबकि स्थानीय नागरिकों ने इस प्रकोप के कारण छह महीने के बच्चे समेत 16 लोगों के दम तोड़ने का दावा किया है। ऐसे में सवाल उठता है जो 16 अर्थियां उठीं, उनकी जान कैसे गई? यह विरोधाभास पैदा करता है। इस बात का आक्रोश लोगों में तब दिखा जब प्रशासन की मौजूदगी में मृतकों के परिजन को 2-2 लाख के चेक सौंपने की कोशिश की गई तब परिजन और महिलाओं ने चेक लेने से इनकार किया। उन्होंने कहा दो सालों से गंदा पानी आ रहा है, शिकायत के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

टैंकर जलापूर्ति में काई मिलने से फूटा लोगों का गुस्सा


त्रासदी के बाद नगर निगम की टैंकर से करायी जा रही जलापूर्ति से भी लोगों का भरोसा टूट गया है। जस्टिस डीडी बंसल व जस्टिस राजेन्द्र कुमार वाणी की अवकाशकालीन डिवीजन बेंच में पेश रिपोर्ट में निगम ने दावा किया है कि भागीरथपुरा में सब अच्छा हो गया। पानी भी साफ आ रहा है। लेकिन शनिवार को एक टैंकर में काई मिलने के बाद लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और पानी लिए बिना ही टैंकर लौटा दिया गया। पानी के अब भी दूषित होने की आशंकाओं के चलते भागीरथपुरा के लोग पानी इस्तेमाल करने से डर रहे हैं।

डिस्चार्ज के बाद भी परेशानी, देनी पड़ रही दोगुनी एंटीबायोटिक


डिस्चार्ज के बाद भी करीब 20 प्रतिशत लोगों को दोबारा अस्पताल में भर्ती कराना पड़ रहा है। ऐसे में परिवार वालों का कहना है कि अस्पताल से छुट्टी मिलने पर वह पूरी सावधानी बरत रहे हैं। सिर्फ़ उबला पानी पिला रहे हैं इसके बावजूद भी तबीयत में सुधार नहीं हो रहा है। भागीरथपुरा निवासी रजनी एक ऐसी ही मरीज हैं जो तीन दिनों तक अरबिंदो अस्पताल में भर्ती थीं। शुक्रवार को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया लेकिन अस्पताल से आने के बाद सिर दर्द, पेट दर्द, उल्टी की समस्या सामने आने लगी और अचानक तबीयत बिगड़ने लगी। विशेषज्ञों के मुताबिक भागीरथपुरा से जो मरीज आ रहे हैं उनमें उल्टी-दस्त की शिकायत सामान्य मरीजों से अलग है। उनको दोगुनी एंटीबायोटिक देनी पड़ रही है।

बुनियादी ढांचे की विफलता, जवाबदेही का संकट और सत्ता की संवेदनहीन हंसी


जहां पानी पीने से 15 लोगों की मौत हो जाये, कफ सीरप पीने से 25 बच्चों की मौत हो जाये, उस सरकार का मंत्री सवाल पूछने पर कहता है 'घंटा!' इंदौर की दूषित जल संकट ने प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक संवेदनहीनता दोनों को उजागर कर दिया है। इंदौर से मिलने वाला सबक स्पष्ट है कि साफ सड़कें स्वस्थ शहर की पहचान नहीं हैं। जिन शिकायतों को दो साल नहीं सुना गया वहाँ अब अधिकारी क्लोरीन की गोलियां बांटने, मृतकों के लिए 2 लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा करने और कनिष्ठ इंजीनियरों को निलंबित करने में जुटे हैं। ये सब खोखली राजनीति और बुनियादी ढांचे की विफलता, जवाबदेही तय न कर पाने को जगजाहिर करती हैं।

मध्यप्रदेश जल संकट में जिस दयनीय हालातों में लोगों ने अपनी जान गंवाई, वहाँ प्राथमिकता पीड़ित परिवारों को राहत, इलाज और सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने की होनी चाहिए थी। लेकिन इसके बजाय त्रासदी का केंद्र राजनीतिक टकराव बन गया। यह घटना बताती है कि जब जवाबदेही तय करने का समय आता है, तब मानवीय त्रासदी भी सियासी हथियार बना दी जाती है। अगर समय रहते चेतावनियों और टेंडर प्रक्रिया पर कार्रवाई हुई होती, तो शायद मासूम जानें बचाई जा सकती थीं। इंदौर दूषित पानी की खबर मामले में हाईकोर्ट बार एसो. अध्यक्ष रितेश इनानी द्वारा दायर जनहित याचिका पर अब हाई कोर्ट की नियमित खंडपीठ 6 जनवरी को सुनवाई करेगी। ‘स्वच्छ शहर’ के तमगे के पीछे इंदौर में पानी की सुरक्षा के मुद्दे की छिपी यह सच्चाई अब प्रशासन और जनप्रतिनिधियों दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय है।