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इंदौर में जल प्रदूषण: मेयर ने 10 मौतों की सूचना दी – शहर में त्रासदी का साया

 02 Jan 2026

इंदौर में जल प्रदूषण का संकट अब गंभीर रूप ले चुका है। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के भागीरथपुरा इलाके में जल स्रोत में जहरीला मिश्रण मिलने से स्वास्थ्य संकट फैल गया है, जिससे शहरवासियों में भय और आक्रोश फैल गया है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने शुक्रवार को बताया कि उन्हें इस दूषित पानी पीने से अब तक 10 लोगों की मौत की जानकारी मिली है और बहुत से लोग बीमार हैं; हालांकि मौतों का सटीक आंकड़ा विभिन्न पक्षों से अलग-अलग बताया जा रहा है।


नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार के बयान से स्पष्ट होता है कि इंदौर जल प्रदूषण ने सिर्फ स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि शहर की विश्वसनीयता को भी गंभीर चुनौती दे दी है। चर्चा का केंद्र अब यह बन चुका है कि क्यों भारत के “सबसे साफ” शहर में यह त्रासदी हुई और कौन जिम्मेदार है।

दूषित पानी से मौतें और स्वास्थ्य संकट – इंदौर जल प्रदूषण का भयावह असर


इंदौर जल प्रदूषण: भागीरथपुरा इलाके में यह समस्या तब सामने आई जब स्थानीय निवासी उल्टी, दस्त और तेज़ बुखार जैसे लक्षणों से ग्रस्त होने लगे। कई लोगों ने सीधे कहा कि गंदा और बदबूदार पानी उनकी नलों से बह रहा था।

महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार “सात लोगों की मौत” की पुष्टि हुई है, लेकिन उनकी जानकारी में 10 लोगों की मौत की रिपोर्ट मिली है। स्थानीय नागरिकों ने यह भी दावा किया है कि छह महीने के एक बच्चे सहित कम से कम 14 लोगों की मौत हुई है, हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने सभी की पुष्टि नहीं की है।

स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि अब तक लगभग 1500 से अधिक लोग बीमार पड़ चुके हैं, जिनमें से कई अस्पतालों में भर्ती हैं। कुछ अस्पतालों ने रिपोर्ट किया कि 200 से ज्यादा मरीजों का इलाज जारी है और उनमें से कई की हालत गंभीर है। यह त्रासदी इसलिए और चिंताजनक है क्योंकि इंदौर लंबे समय से स्वच्छता और पानी की गुणवत्ता के लिए मिसाल माना जाता रहा है – अब वही शहर इंदौर जल प्रदूषण जैसी भयावह समस्या से जूझ रहा है।

क्यों हुआ यह संकट – गलती किसकी? जांच और प्रशासनिक प्रतिक्रिया


प्रारंभिक जांच से पता चला है कि भागीरथपुरा में मुख्य जल वितरण लाइन में लीकेज हो गई, जिससे सीवेज (गंदा पानी) पीने के पानी में मिल गया। एक अधिकारी के अनुसार यह लीकेज एक पुलिस चेकपोस्ट के पास स्थित पाइपलाइन के नीचे बने शौचालय के कारण संभव हुआ, जहां सुरक्षा टैंक का निर्माण नहीं किया गया था।

इस घटना के बाद सरकार ने आपातकालीन प्रतिक्रिया शुरू की। कई अधिकारियों को निलंबित किया गया या बर्खास्त किया गया है। एक पीएचई अधिकारी को बर्खास्त कर दिया गया है, जबकि दो अन्य को निलंबित कर दिया गया है। एक तीन सदस्यीय जांच समिति भी घोषित की गई है जो मामले की गहन समीक्षा करेगी।

राज्य सरकार ने फोरेंसिक जांच और जल परीक्षण जारी रखा है, ताकि पता चल सके कि पानी में कौन-सी बीमारियाँ फैल रही हैं और किस स्तर पर दूषण हुआ है। फिलहाल हैजा के संभावित प्रसार पर भी स्वास्थ्य विभाग अलर्ट पर है।

मुख्य सचिव को भी स्थिति की रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है, और एनएचआरसी (National Human Rights Commission) ने इस मुद्दे पर रूप-रेखा रिपोर्ट मांगी है, यह कहते हुए कि जनता के मूलभूत अधिकारों का हनन हुआ है।

प्रभाव, राजनीतिक विवाद और जनता की प्रतिक्रिया


इस संकट का सबसे बड़ा असर स्थानीय जनता पर पड़ा है, जिनका रोज़मर्रा का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। लोग अस्पतालों में अपने बिमार परिजनों का इलाज करा रहे हैं और घरों में भय का माहौल है। कई लोगों ने कहा कि शिकायतें पहले से कई बार नगर निगम और पार्षद के पास दर्ज कराई गईं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

राजनीतिक मोर्चे पर भी यह मुद्दा गरमा गया है। विपक्षी दलों ने सरकार पर “लापरवाह” होने का आरोप लगाया है और कहा कि देर से उठाए गए कदम से स्थिति और बिगड़ी है। कुछ लोगों ने कहा कि प्रशासन “इंदौर जल प्रदूषण” की गंभीरता को गंभीरता से नहीं ले रहा था, जिसके कारण बड़े पैमाने पर जनहानि हुई है।

इसी बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पीड़ितों के परिवारों को ₹2 लाख की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है और कहा है कि प्रभावित लोगों का इलाज सरकार निशुल्क करेगी। यह घोषणा राहत देने वाली है, लेकिन कई परिवारों का कहना है कि इससे जीवन नहीं लौटेगा – जिम्मेदारों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए।