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श्री शशि थरूर कहते हैं: वंशवाद‑राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए गम्भीर खतरा ।

 02 Feb 2026

शशि थरूर ने वंश‑राजनीति को ‘परिवार का कारोबार’ कहा


भारतीय राजनीति में वंशवाद का बोलबाला है और इस पर शशि थरूर ने हाल ही में खुलकर टिप्पणी की है कि वंश‑राजनीति (dynastic politics) हमारे लोकतंत्र के लिए “गंभीर खतरा” बन चुकी है। उन्होंने एक लेख में लिखा है कि जब राजनीतिक नेतृत्व वंश से तय हो जाता है न कि क्षमता, प्रतिबद्धता या जमीनी जुड़ाव से, तब शासन की गुणवत्ता और जवाबदेही दोनों कमजोर पड़ जाती है।

शशि थरूर ने ‘Indian Politics Are a Family Business’ शीर्षक से प्रकाशित अपने आलेख में यह बात कही कि भारत में एक परिवार ने दशकों तक राजनीति पर छाया रखा — और उसके प्रभाव ने यह धारणा पुख्ता कर दी कि राजनीतिक नेतृत्व जन्म‑अधिकार (birthright) हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि यह प्रवृत्ति सिर्फ एक पार्टी तक सीमित नहीं है बल्कि देश के सभी स्तर, सभी क्षेत्रों तक फैली हुई है।

शशि थरूर इन बातों पर ज़ोर देते हैं कि अब समय आ गया है कि भारत वंशवाद (dynasty) को छोड़कर योग्यता (meritocracy) की ओर चलें। उन्होंने सुझाव दिया है कि इसके लिए आंतरिक पार्टी लोकतंत्र को सुदृढ़ करना, सदस्यों के लिए चुनाव प्रक्रिया को वास्तविक बनाना, तथा मतदाताओं को ऐसे नेताओं को चुनने में सक्षम बनाना आवश्यक है जिनकी पहचान सिर्फ नाम से नहीं बल्कि काम और जमीनी अनुभव से हो।

उनके इस बयान पर राजनीतिक हलचलों की शुरुआत हो चुकी है। Bharatiya Janata Party ने शशि थरूर के इन विचारों का स्वागत किया है और इसे अवसर माना है कि वे खुद भी उस बात को कह रहे हैं जो दीगर नेताओं पर आरोप है। दूसरी ओर, Indian National Congress के भीतर असमंजस और सवाल‑चिन्ह उभरने लगे हैं क्योंकि उन्होंने यह माना कि शशि थरूर की टिप्पणी सीधे उनके दल के परंपरागत नेतृत्व मॉडल को चुनौती देती है।

शशि थरूर की राय – वंशवाद से चलेगा नहीं, योग्यता से चलेगा लोकतंत्र


शशि थरूर का तर्क यह है कि राजनीति में वंश‑चालित व्यवस्था न सिर्फ नए और होनहार नेतृत्व को अवसर से वंचित करती है बल्कि सामाजिक‑आर्थिक विविधताओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक पहुँचने से रोकती है। उनका कहना है: “जब राजनीतिक शक्ति वंश द्वारा तय होती है, न कि क्षमता या प्रतिबद्धता द्वारा, तो शासन‑प्रशासन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।”

विश्लेषक बताते हैं कि वंश‑राजनीति सिर्फ नाम‑परिवार के हस्तांतरण का मामला नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक दलों के अंदरूनी लोकतंत्र को कमजोर करती है — जैसे टिकट वितरण, मोर्चों का चयन, निर्णय लेने की प्रक्रियाएं। शशि थरूर ने लिखा है कि सुधार तभी संभव होगा जब दलों के भीतर सशक्त आंतरिक चुनाव हों, समय‑सीमा के प्रावधान हों और जनता को यह भरोसा हो कि नेतृत्‍व केवल खानदान की मोहर नहीं है।

उनकी टिप्पणी इस बात पर भी रोशनी डालती है कि भारतीय लोकतंत्र का आदर्श “जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का” (government of the people, by the people, for the people) तभी सार्थक हो पायेगा जब नेतृत्व सिर्फ नाम, रिश्तों या पुश‑प्रभाव के आधार पर न हो बल्कि जमीनी काम, प्रमाणित क्षमता और जवाबदेही पर आधारित हो।

उनके इस प्रवचन ने इसे भी दर्शाया है कि वंश‑राजनीति सिर्फ राष्ट्रीय स्तर की समस्या नहीं बल्कि राज्य‑क्षेत्रीय स्तर पर भी व्याप्त है — कई प्रदेशीय दलों में नेताओं की उत्तराधिकार व्यवस्था देखी जाती है। शशि थरूर ने उदाहरण दिए कि कैसे राज्य‑स्तर‑दल‑नेतृत्व में भी वंश‑गतांतर दिखता है।

शशि थरूर के बयानों पर पार्टी‑पटल पर उठते सवाल‑चिन्ह


शशि थरूर की टिप्पणी ने कांग्रेस के अंदर खलबली मचा दी है — क्योंकि यह उस परंपरा को चुनौती देती है जिसे पार्टी ने अपने भीतर वर्षों तक बनाए रखा है। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है, पार्टी की नहीं।

वहीं भाजपा‑नेताओं ने इसे कांग्रेस‑परिवार की राजनीति पर एक अवसर माना। उदाहरण के लिए, मंत्री Dharmendra Pradhan ने कहा कि शशि थरूर के इस लेख से स्पष्ट है कि कुछ लोग खुद उस स्थिति से गुज़रे हैं जिसे वे आलोचना कर रहे हैं — यानी वंश‑राजनीति के अंदरूनी अनुभव।

यह चर्चा अभी इससे भी आगे जा रही है कि क्या इन बयानों के बाद शशि थरूर को पार्टी में कोई कार्रवाई झेलनी पड़ेगी — क्योंकि इससे दल‑नियंत्रण, टिकट नीति, इन्टरनल लोकतंत्र सहित कई संवेदनशील मुद्दे फिर से सामने आए हैं।