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बिहार विधानसभा चुनाव में दांव-पेंच: अमित शाह-राहुल गांधी के बीच जमकर बिगुल बजा
02 Feb 2026
राजनीतिक हलचल की दृष्टि से यह घड़ी बहुत अहम है — जब 2025 बिहार विधानसभा चुनाव के पथ पर देश के शीर्ष नेता मैदान में उतर चुके हैं। इस बार की 2025 Bihar Legislative Assembly election में Amit Shah और Rahul Gandhi जैसे दिग्गज नेताओं ने सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी है। इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे इन दो नेताओं की रणनीति, रैलियाँ एवं बयानबाजी बिहार की राजनीति को नए दिशा में ले जा रही हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव में अमित शाह का विकास-जंगलराज मुकाबला
Amit Shah ने बिहार में अपनी रैलियों में विकास का एजेंडा बहुत जोर-शोर से उठाया है। उन्होंने कहा है कि यह केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि तय है कि “विकास राज” आएगा या फिर “जंगल राज” लौटेगा।
शाह ने जिले-जिले में कहा कि अगर Rashtriya Janata Dal एवं Indian National Congress की सरकार बनी तो बिहार में ‘जंगलराज’ फिर से सक्रिय हो जाएगा। उन्होंने इस चुनाव को सिर्फ सीटों की जंग न मानने की बात कही है बल्कि इसे राज्य के भविष्य का रणस्थल बताया है।
उनका कहना है कि उनकी गठबंधन सरकार (National Democratic Alliance) अधिकतर सीटें हासिल करेगी, और राज्यों में पहली बार १६०-से अधिक सीटों का लक्ष्य रखा गया है।
उदाहरण के लिए, कहा गया कि हर “घुसपैठिए” को बाहर किया जाएगा — शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में यह मुद्दा उन्होंने प्रमुखता से उठाया है।
यह रणनीति इसलिए बड़ी है क्योंकि विकास, कानून-व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा जैसे मुद्दे बिहार में लंबे समय से जनता और राजनीतिक दलों के बीच चले आ रहे हैं। शाह ने इसे चुनावी विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
बिहार विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा और रणनीति
Rahul Gandhi ने भी इस 2025 Bihar Legislative Assembly election में सक्रियता दिखाई है। उन्होंने राज्य में “वोट अधिकार यात्रा” के नाम से चलने वाली गतिविधियों में हिस्सा लिया, जो कि मताधिकार, वोट रोल में संशोधन व अन्य चुनावी प्रक्रियाओं की चुनौतियों को लेकर थी।
उनका रुख था कि मौजूदा प्रक्रियाओं में कुछ खामियाँ हैं — विशेष रूप से Special Intensive Revision (SIR)-वोटर सूची संशोधन प्रक्रिया पर उन्होंने सवाल उठाए हैं।
उनके अभियान ने यह संदेश दिया कि “बिहार में मताधिकार का संरक्षण” और दल-दल-जात-आधारित राजनीति से पार ले जाने का समय है। इस तरह उन्होंने संवैधानिक अधिकारों तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपने अभियान की धुरी बनाया है।
हालांकि, उनके विरोधियों का कहना है कि यह यात्रा कुछ हिस्सों में प्रतीकात्मक हैं — और वास्तविक एजेंडा विकास नहीं बल्कि वोट बैंक सक्रियता है।
इस तरह राहुल गांधी की रणनीति “मूल ढांचे को बदलो” के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है, जबकि अमित शाह की रणनीति “विकास बनाम जंगलराज” के रूप में सामने है। यह मुकाबला बिहार विधानसभा चुनाव के परिदृश्य को और भी दिलचस्प बना रहा है।
बिहार विधानसभा चुनाव में दो शीर्ष नेताओं की रैलियों का असर और जनता की प्रतिक्रिया
जब दो ऐसे नेता मैदान में हों जिनकी आवाज़ और फोकस अलग-अलग हो, तो इसका असर बेज़बुद्धा नहीं होता। बिहार में अमित शाह एवं राहुल गांधी की रैलियों ने व्यापक जनसमर्थन के साथ ही चुनौतियाँ भी पेश की हैं।
शाह ने कहा कि बिहार की जनता ऐसे दलों को नहीं चुनेगी जिनके कार्यकाल में कानून-व्यवस्था चरमराई थी, भ्रष्टाचार फैला था, और भूमि-भगोड़ा-घोटाले आम थे।
उनकी रैलियों में उनकी टिप्पणी रही कि “14 नवंबर को चौथी दिवाली मनाई जाएगी” जब एनडीए बड़ी जीत हासिल करेगी।
दूसरी ओर, राहुल गांधी की रैलियाँ और यात्रा ने SIR एवं वोटर सूची जैसे तकनीकी विषयों को सामने रखा है। विरोधियों ने कहा कि इन्हें कम समझने वालों के लिए बूथ-रोड स्तर पर संवाद करना कठिन हो सकता है।
जन-मंच पर यह दोनों दृष्टिकोण अलग-अलग लोगों को अपील करते दिख रहे हैं — विकास-वोट बैंक-सहयोग ग्राफ, जात-क्षेत्रीय समीकरण, युवा-प्रवासियों की चिंता आदि।
विश्लेषकों का कहना है कि इस चुनाव में रैली-संवाद का महत्व इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि सामाजिक मीडिया, जन-समूह और स्थानीय नेतृत्व सभी सक्रिय हैं। इसलिए दोनों पक्षों ने अपनी मुख्य रैलियों के साथ बूथ-स्तर पर कार्यकर्ताओं को गति दी है।
वहीं आम जनता की प्रतिक्रिया मिश्रित है। कुछ लोग विकास-वादा सुनने को तत्पर हैं, जबकि अन्य वोटर सूची और मताधिकार के विषय पर अधिक सतर्क हैं — खासकर युवा एवं प्रवासी श्रमिक वर्ग। यह संकेत है कि इस बार के 2025 Bihar Legislative Assembly election में “वोट देने वालों” का अनुभव और जागरूकता पिछले मुकाबलों से कहीं अधिक है।
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