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दिल्ली के छठ घाटों पर बिछी बिहार चुनाव की बिसात — यमुना की आड़ में मास्टर-प्लान कैसे तैयार हुआ?

 02 Feb 2026

बिहार चुनाव की बिसात : बिसात बिछाने की शुरुआत


दिल्ली में इस वर्ष छठ पूजा को विशेष स्थान दिया गया है। राजधानी में लगभग 1,500 घाटों पर छठ समारोह का आयोजन होगा, जिनमें से प्रमुख तालमेल यमुना नदी के किनारे बनाए जा रहे घाटों में दिख रहा है।

सरकार का दावा है कि यह कदम धार्मिक श्रद्धा का सम्मान है — लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे “बिहार चुनाव की बिसात” के रूप में देख रहे हैं। पूर्वांचल-मूल के नए मतदाताओं को सक्रिय करने के उद्देश्य से किए जा रहे इस आयोजन में न सिर्फ धार्मिक परंपरा बल्कि राजनीति का धुंधला मेल देखने को मिल रहा है।

मॉडल घाटों से मास्टर-प्लान तैयार


राजधानी दिल्ली के भाजपा-शासित प्रदेश में इस बार मॉडल व्यवस्था पर जोर दिया गया है — 23 प्राकृतिक घाट यमुना में तथा लगभग 1,300 आर्टिफिशियल घाट शहर में बनाए जाने वाले हैं। साथ ही लगभग 100 स्थानों पर अस्थायी घाट बनाने की योजना चल रही है।

इन व्यवस्था-कार्यों के कुछ प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं:

  • यमुना के किनारे विशेष घाट-निर्माण और सजावट।

  • जल-प्रवाह बढ़ाने, फोम नियंत्रण तथा स्वच्छता सुनिश्चित करने की पहल।

  • पूर्वांचल-मूल भाषा (बोली, मैथिली, भोजपुरी) में सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा विशेष सुविधाएँ।

फिर भी नींव में प्रश्न दबा है — क्या ये व्यवस्थाएँ सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं या राजनीतिक रणनीति का हिस्सा? राजनीति-विश्लेषकों की निगाह में यह पूरी तैयारी बिहार चुनाव की बिसात के अनुरूप लग रही है।

राजनीति, भावनाएं और चुनावी बिसात


विश्लेषक बताते हैं कि दिल्ली में छठ पूजा का यह पैकेज पूर्वांचल तथा बिहार-मूल समुदाय के प्रति संदेश देने का तरीका है। बाल्कि भारतीय जनता पार्टी द्वारा इसे इस समुदाय में अपनी पैठ बढ़ाने का अवसर माना जा रहा है। जाहिर है — धार्मिक आयोजन सामाजिक-संस्कृतिक महत्व रखता है, लेकिन इसमें राजनीति छुपी नजर आ रही है।

उदाहरण के लिए :

  • कांग्रेस ने वादा किया था कि अगर दिल्ली में सत्ता में आएगी तो यमुना के किनारे एक समर्पित छठ घाट बनाएगी।

  • भाजपा ने इस वर्ष “छठ पूजा करीब यमुना घाट” को अपने चुनावी वादों का एक हिस्सा बताया है।

ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि छठ घाटों के माध्यम से मुस्लिम-हिन्दू विभाजन के पार भी बिहार-मूल वोटर-बैठक को प्रोत्साहित किया जा रहा है — यानी बिहार चुनाव की बिसात दिल्ली में भी बिछ रही है।

चुनौतियाँ और प्रश्न चिन्ह

हालाँकि व्यवस्थाएँ बढ़ाई गई हैं, पर कुछ चुनौतियाँ और सवाल आज भी बने हुए हैं — जैसे :

  • यमुना नदी की आज भी व्यापक प्रदूषण समस्या : घोल-फोम, गंदा जल, सीमित प्रवाह।

  • ‘घाट’ तो बनाए जा रहे हैं, लेकिन क्या नियमित-सुरक्षात्मक एवं पर्यावरण-मानक टिकेंगे?

  • क्या यह आयोजन समर्पित श्रद्धा के नाम पर कुछ चुनावी ‘प्रचार’ का माध्यम बन रहा है? सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि कहीं यह सिर्फ फोटो-ऑप नहीं?

  • पूर्वांचल-मूल समुदाय की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर ध्यान कम और ‘घाट निर्माण’ पर अधिक फोकस।

इन बिंदुओं के अंतर्गत यह साफ है कि आयोजन सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक-सांस्कृतिक धरातल पर भी रखा गया है। खासकर तब, जब बिहार में चुनावी माहौल बन चुका है, तो दिल्ली की घाट-योजनाएँ “बिहार चुनाव की बिसात” का हिस्सा बन जाती हैं।

निष्कर्ष


दिल्ली में छठ पूजा के लिए यमुना के किनारे घाटों का विस्तृत निर्माण और बड़े पैमाने पर व्यवस्था — इसे अगर सिर्फ श्रद्धा-भूमि माना जाए तो अधूरा होगा। यह बेहद रणनीतिक फैसला है, जिसमें समाज-संस्कृति, धार्मिक आयोजनों और राजनीति का ठोस संयोजन है। ऐसे में कह सकते हैं कि दिल्ली के छठ घाटों पर बिछी बिहार चुनाव की बिसात — जिसमें पूर्वांचल-मूल समुदाय को केंद्र में रखकर आगामी चुनावी दांव-पेंच तैयार हो रहा है।

फिर भी अंतिम फैसला चुनाव के बाद ही सामने आएगा — क्या यह आयोजन वास्तव में समुदाय के लिए श्रद्धा-स्वरूप साबित होगा, या चुनावी रणनीति का हिस्सा बनेगा? दिल्ली-यमुना की आड़ में बिछी यह बिसात अब परीक्षा के वक्त है।