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एक प्रोफेसर की बर्खास्तगी पर हाईकोर्ट की रोक क्या, CUH विश्वविद्यालय “autonomy” की आड़ में जवाबदेही से बच रहा!

 02 Feb 2026

हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर मोनिका मलिक को एक साल बाद भी इंसाफ नहीं मिला है। विश्वविद्यालय ने कोर्ट के आदेश के बाद भी मोनिका मलिक के पद और उनके कार्यालय में प्रवेश पर रोक जारी रखी है। जिसको लेकर वह बीते एक साल से आवाज उठा रही हैं,लेकिन उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। विश्वविद्यालय का आऱोप है कि मोनिका मलिक की नियुक्ति में गडबड़ी है।इसी कारण यूनिवर्सिटी ने मोनिका मलिक को निलंबित कर दिया था। जबकि मोनिका मलिक ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर मनमानी और प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। शिकायतों के बाद भी मामले में कुलपति ने काई कार्रवाई नहीं की है। क्या है पूरा मामला विस्तार से जानते हैं।


विश्वविद्यालय परिसर में माहौल इन दिनों तनावपूर्ण है।


दरअसल मोनिका मलिक एक साल से लॉ विभाग में धरने पर बैठी हैं और अपने हक़ के लिए आवाज़ उठा रही है। मोनिका का कहना है यूनिवर्सिटी पिछले एक साल से उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान कर रही है। यहाँ तक कि यूनिवर्सिटी के हास्टल में खाना खाने पर भी पाबंदी लगा दी। मोनिका मलिक के पति राकेश मलिक भी लॉ विभाग में काम करते है लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनकी सैलरी भी यूनिवर्सिटी ने रोक दी थी।विश्वविद्यालय का कहना था कि नई पेंशन योजना में खाता खुलवाना अनिवार्य है, अन्यथा वेतन नहीं दिया जाएगा। उनके 3 बच्चे है ऐसे में हमारी जीविका पर गहरा असर पड़ा है। कोर्ट के आदेश के बाद मैंने कई पत्र लिखे वीसी से लेकर रेजिस्ट्रार तक। लेकिन कोई भी कोर्ट का आदेश मानने को तैयार नहीं है।

25 जुलाई को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा के केंद्रीय विश्वविद्यालय (CUH), महेंद्रगढ़ द्वारा लॉ विभाग की प्रोफेसर मोनिका मलिक को हटाने के आदेश पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने साफ़ कहा था मोनिका की पोज़िशन को कार्यरत माना जाएगा पर अदालत का आदेश आने के दो महीने बाद भी मोनिका का ऑफिस अब भी खाली पड़ा है।

मामला कैसे शुरू हुआ


साल 2024 में केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा (CUH) के लॉ विभाग के डीन प्रदीप सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनका आरोप था कि प्रोफेसर मोनिका मलिक की नियुक्ति में नियमों का पालन नहीं हुआ। प्रदीप सिंह ने कहा कि मोनिका और डॉ. डी. पी. एस. पुनिया की नियुक्ति में गड़बड़ियाँ थी। इससे चयन प्रक्रिया में पक्षपात हुआ था। मोनिका के पति राकेश मलिक विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद के सदस्य थे। यूजीसी के नियमों के अनुसार किसी भी प्रोफेसर के चयन के दौरान उसका कोई रक्त संबंधी चयन प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चाहिए। प्रदीप का मानना था कि राकेश मलिक ने अपने प्रभाव का उपयोग करके अपनी पत्नी को नौकरी दिलवाई है।

जबकि विश्वविद्यालय ने डॉ. डी. पी. एस. पुनिया को पुननियुक्त कर लिया है। सूत्रों के अनुसार एक नई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिसके तहत उनका साक्षात्कार कराया गया। अब वह विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

प्रदीप की याचिका के बाद केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा ने 2 मई 2025 में मामले की जांच खुद की। 2 मई 2025 को विश्वविद्यालय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल की बैठक में फ़ैसला लिया गया कि नियुक्ति में गड़बड़ी हुई थी। जिसके चलते CUH ने 7 मई 2025 को मोनिका मलिक और डॉ. पुनिया की सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी किया। विश्वविद्यालय ने कहा कि दोनों प्रोफेसर कार्य में लापरवाही बरत रहे थे।

मोनिका मलिक ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि उन्हें अपनी बात रखने का मौका मिला था लेकिन निर्णय अन्यायपूर्ण था। 30 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने CUH के सेवा समाप्ति आदेश पर रोक लगा दी। मोनिका मलिक का दावा है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा (CUH) और लॉ विभाग के डीन प्रदीप सिंह ने मिलकर उन्हें निशाना बनाया, जिसके बाद विश्वविद्यालय ने प्रदीप सिंह को लगातार पदोन्नतियां दीं। उनका कहना है कि हाईकोर्ट द्वारा सेवा समाप्ति पर रोक लगाए जाने के बावजूद उन्हें अब तक अस्थायी रूप से विश्वविद्यालय में कार्य पर बहाल नहीं किया गया है। मोनिका ने इस संबंध में कई बार विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को पत्र लिखे हैं। लेकिन अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई जवाब नहीं मिला है।। अब यह सुनवाई 29 नवंबर 2025 को होनी है।

हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रों का आरोप है कि प्रोफेसर मोनिका मलिक के समर्थन में आवाज उठाने वाले छात्रों को प्रशासन निशाने पर ले रहा है किसी को निष्कासित किया गया, तो किसी को परीक्षा में बैक दे दी गई। वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन आधिकारिक तौर पर इस पर “नो कमेंट्स” की नीति अपनाए हुए है।

झूठे आरोप लगाकर निकाल दिया गया नाम बदलने की शर्त पर आयुष बताते हैं,दो महीने पहले मुझे यहाँ से निकाल दिया गया था। प्रॉक्टर ने मीटिंग में बुलाकर मुझ पर झूठे आरोप लगाए। एक प्रोफेसर, जो फैकल्टी टीचर हैं, तीसरे सेमेस्टर में आई थीं, लेकिन दूसरे सेमेस्टर के दौरान मुझ पर छेड़छाड़ के आरोप लगाकर मुझे निष्कासित कर दिया गया। यह सब प्रोटेस्ट के बाद ही हुआ।

प्रोटेस्ट में शामिल होने पर एडमिशन कैंसल की धमकी


छात्रा सुहासिनी (बदला हुआ नाम) बताती हैं,”मोनिका मलिक को टॉर्चर किया जा रहा है। जब मैं समर्थन में शामिल हुई थी, तब मुझे कहा गया कि अगर दोबारा प्रोटेस्ट करते दिखीं तो एडमिशन कैंसल कर देंगे। इसके बाद क्लास में भी उन्हीं छात्रों को टारगेट किया गया जो मोनिका के पक्ष में थे। छोटी-छोटी बातों में भेदभाव किया जाने लगा कम मार्क्स देना, क्लास में अपमान करना। ये सब ब्लैकमेल जैसा था।”

CUH Notice

 

प्रोटेस्ट में शामिल न होने का नोटिस आया


सुशील, जो ढाई साल से लॉ विभाग के छात्र हैं, कहते हैं “जब मैं मोनिका के समर्थन में खड़ा हुआ तो यूनिवर्सिटी ने मेरे घर कॉल किया। मेरे भाई को कहा गया कि कोई भी बच्चा प्रोटेस्ट में शामिल नहीं होगा। ऑफिस की तरफ से एक नोटिस भी जारी हुआ जिसमें लिखा था कि अगर कोई छात्र प्रदर्शन में शामिल होगा तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।”

कोर्ट का आदेश भी नज़रअंदाज़


नीरज, जो पिछले दो साल से विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हैं, बताते हैं “मैं प्रोटेस्ट में शामिल नहीं था, लेकिन सच्चाई सबको पता है। मोनिका मलिक के फेवर में कोर्ट का आदेश आ चुका है सैलरी देने और ऑफिस वापस करने का। फिर भी प्रशासन चुप है। यहाँ सरेआम गुंडागर्दी हो रही है। फैकल्टी तक इसमें शामिल है। मोनिका के ऑफिस से चोरी भी की गई थी, उनका सामान बिना बताए बाहर निकाल दिया गया।”

 

प्रशासन विश्वविद्यालय के एक उच्च अधिकारी ने अनौपचारिक रूप से बताया, मोनिका मलिक केस में कार्रवाई पूरी प्रक्रिया और सीसीएस नियमों (CCS Rule) के तहत की गई थी। एक स्वतंत्र समिति से भी सलाह ली गई थी। मामला फिलहाल कोर्ट में है। हालांकि विश्वविद्यालय का आधिकारिक बयान सिर्फ इतना रहा “नो कमेंट्स।”

क्या है CCS Rule


हरियाणा सिविल सर्विस (दंड एवं अपील) नियम, 1964 के तहत किसी सरकारी कर्मचारी या विश्वविद्यालय कर्मी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तभी की जा सकती है जब प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष हो।पर सवाल ये है कि जब मामला कोर्ट में है और स्टे ऑर्डर लागू है, तो किस आधार पर मोनिका को उनके पद पर लौटने से रोका जा रहा है? जबकि मॉलिटिक्स को मिली रिपोर्ट के अनुसार प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए बनी कमेटी में मोनिका मलिक के पति प्रोफेसर राजेश कुमार मलिक का नाम शामिल नहीं था। उन्होंने पहले ही एक एप्लीकेशन यूनिवर्सिटी को सौंपकर व्यक्तिगत कारणों से इस कमिटी में शामिल न होने का आग्रह किया था जिसके बाद लॉ डिपार्टमेंट के लिए नियुक्त होने वाली एसोसिएट प्रोफेसर की जाँच कमेटी से वह बाहर हो गए थे।

सिलेक्शन कैसे किया जाता है


नियम 2 (1) के अनुसार असिटेंट प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर को नियुक्त करने के लिए 6 लोगों की बेंच की जरूरत होती है। जिसमें VC समिति के अध्यक्ष होते हैं। Dean of the concerned School/Faculty संबंधित विभाग के अधीन डीन। Head of the concerned Department उस विभाग के प्रमुख जहाँ नियुक्ति होनी है। Subject Experts (2 बाहरी विशेषज्ञ) संबंधित विषय के दो बाहरी विशेषज्ञ, जिन्हें विश्वविद्यालय द्वारा नामित किया जाता है। ये विशेषज्ञ किसी अन्य विश्वविद्यालय या संस्थान से होते हैं। प्रतिनिधि SC/ST/OBC/PwD वर्ग से यदि आवश्यक हो तो आरक्षण नीति के अनुसार होना चाहिए।एक महिला सदस्य यदि संभव हो तो लैंगिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए। यह समिति उम्मीदवारों के शैक्षणिक योग्यता, शोध कार्य, अनुभव और इंटरव्यू प्रदर्शन के आधार पर चयन करती है।

सिलेक्शन कमिटी और विवाद की जड़


मोनिका मलिक की नियुक्ति दिसंबर 2019 में एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर तैनात हुई थी।कमेटी में कुल छह सदस्य थे प्रो. आर.सी. कूहड़, प्रो. आर.के. मित्तल (चौ. बंसीलाल यूनिवर्सिटी), प्रो.राजपाल शर्मा (कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी), प्रो. परमजीत सिंह (पंजाब यूनिवर्सिटी), प्रो. सुनील देशता (हिमाचल प्रदेश), और डॉ. वागेश्वरी देसवाल (दिल्ली यूनिवर्सिटी)।

13 दिसंबर 2019 को मोनिका मलिक समेत तीन उम्मीदवार इस कमेटी के सामने पेश हुए।लेकिन यहीं से विवाद शुरू हुआ याचिकाकर्ता प्रदीप सिंह ने आरोप लगाया कि चयन प्रक्रिया में मोनिका के पति प्रो.राजेश मलिक का प्रभाव था।हालांकि, दस्तावेज़ों के मुताबिक प्रो. राजेश मलिक ने खुद व्यक्तिगत कारणों से कमेटी से नाम वापस ले लिया था।

दिल्ली साकेत कोर्ट के वकील ओमकार सक्सेना ने मोलिटिक्स को बताया जब किसी विश्वविद्यालय द्वारा उच्च न्यायालय के अंतरिम स्थगन आदेश (interim stay order) की अवहेलना करते हुए याचिकाकर्ता को पुन कार्यभार ग्रहण करने की अनुमति नहीं दी जाती, तो यह न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवमानना (willful disobedience) मानी जाती है। ऐसे में यह कृत्य अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(ब) के अंतर्गत नागरिक अवमानना (Civil Contempt) के श्रेणी में आता है, जिसके लिए धारा 12 के तहत दंड का प्रावधान है। उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार याचिकाकर्ता को निरंतर सेवा में मानते हुए कार्य करने, वेतन प्राप्त करने तथा सभी सेवा लाभ उठाने का अधिकार दिया जाना चाहिए था।

प्रोफेसर विनोद गोयल, गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय (हिसार) और शिक्षक संघ के अध्यक्ष ने मोलिटिक्स को बताया कि किसी सेवा कर्मचारी को बर्खास्त करने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है, लेकिन यूनिवर्सिटी ने उस प्रक्रिया का पालन नहीं किया। जब चयन यूनिवर्सिटी द्वारा किया गया था, तो गलती किसकी थी? जिस प्रोफेसर को नौकरी का प्रस्ताव देकर नियुक्त किया गया, बाद में उन पर लगे आरोपों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच क्यों नहीं की गई? कोर्ट ने स्थगन आदेश (स्टे) दे दिया है, फिर भी यूनिवर्सिटी अपने ही कर्मचारी का समर्थन नहीं कर पा रही है। किसी प्राधिकरण की अध्यक्षता पक्षपाती नहीं होनी चाहिए।

मॉलिटिक्स ने हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कुछ भी बोलने से मना कर दिया है। अगर यूनिवर्सिटी की तरफ से कोई भी रेपोनस आता है तो इस आर्टिकल को अपडेट कर दिया जाएगा।

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