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जब यूरोप की सड़कों पर भड़के विरोध, अटल बिहारी की रणनीति भारत के लिए क्यों जरूरी है
12 May 2026
सुबह उठते ही न्यूज फीड में दिखा कि मिलान की सड़कें जल रही हैं। बंदरगाह ठप हैं, ट्रेनें रुक गई हैं, यूनिवर्सिटी के छात्र नारे लगा रहे हैं। पहली नजर में लगता है, ये किसी फिल्म की सीन हो सकती है, लेकिन यह वास्तविकता है।
और जैसे ही मैंने यह देखा, दिमाग में याद आया अटल बिहारी वाजपेयी का वह वाक्य, 2003 का। इराक युद्ध के समय संसद में उन्होंने कहा था
“भारत अमेरिकी दबाव में झुककर इराक में सैनिक नहीं भेजेगा। हमारी नीति स्वतंत्र है और हम अपनी जनता की भावनाओं के खिलाफ कदम नहीं उठा सकते।”
बस यही लाइन मुझे समझाती है कि मिलान में क्या हो रहा है और भारत के लिए क्या सबक है।
मिलान की आग और सरकार बनाम जनता का संघर्ष
प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा कि इटली अभी फ़लस्तीन को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता नहीं देगा। इसके बाद क्या हुआ? मिलान की सड़कें जल उठीं। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें, बंदरगाहों और रेलवे का ठप होना दिखाया कि जनता का गुस्सा कितना तेज़ हो सकता है।
इसे केवल विदेश नीति का मामला मत समझिए। यह जनता और सरकार के बीच खाई का सबसे साफ उदाहरण है। जब सरकार जनता की भावनाओं से अलग कदम उठाती है, तो नतीजा सिर्फ़ रिपोर्ट में नहीं, सड़क पर दिखाई देता है। मैं सोचता हूँ अगर भारत में ऐसा होता, क्या हमारी संसद इतनी शांत रहती? इतिहास बताता है कि जवाब नहीं है।
भारत की विदेश नीति का इतिहास और नैतिक दृष्टिकोण
भारत ने फ़लस्तीन को 1988 में मान्यता दी। राजीव गांधी सरकार का यह कदम सिर्फ़ कूटनीतिक नहीं था। यह नैतिक दृष्टिकोण और जनता की भावनाओं का प्रतिबिंब था। नई दिल्ली में फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) का दफ़्तर खोला गया।
महात्मा गांधी ने 1938 में लिखा था “फ़लस्तीन यहूदियों का नहीं, अरबों का है।” ये सिर्फ़ शब्द नहीं थे। यह उस नैतिक दृष्टिकोण का प्रतिबिंब था जिस पर भारत की विदेश नीति हमेशा टिककर काम करती रही। इसी संतुलन ने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग पहचान दी। यही फर्क है इटली के वर्तमान संकट और भारत की स्थिर दृष्टि में।
मिलान से भारत को सीख
सोचिए, मिलान में क्या हो रहा है। यूनिवर्सिटी के बच्चे तख्तियां लेकर खड़े हैं। मजदूर पोर्ट्स बंद कर रहे हैं। जनता का गुस्सा इतनी तीव्रता से बाहर निकल रहा है कि सरकार उसे दबाने की कोशिश कर रही है।
भारत ने भी ऐसे समय देखे हैं।
1974 की रेलवे हड़ताल
1974 में भारत में रेलवे कर्मचारियों की सबसे बड़ी हड़ताल हुई। लगभग 17 लाख कर्मचारी इसमें शामिल थे। हड़ताल का नेतृत्व जॉर्ज फ़र्नांडिस ने किया। कर्मचारी बेहतर वेतन, सुरक्षित काम का माहौल और नौकरी की गारंटी मांग रहे थे। हड़ताल इतनी व्यापक थी कि रेल नेटवर्क पूरी तरह ठप हो गया। देशभर की रेल सेवाएं बंद हो गईं।
सरकार को तुरंत बातचीत करनी पड़ी और अंततः मजदूरों की मांगों को मान्यता मिली। इस घटना ने साफ कर दिया कि जब जनता संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, तो सरकार को झुकना पड़ता है।
यह मिलान की घटनाओं की तरह है। जब जनता की भावनाओं को नजरअंदाज किया जाता है, तो परिणाम तेज और हिंसक हो सकते हैं।
खाड़ी युद्ध और भारत की सुरक्षा क्षमता
1990 के अंत और 1991 की शुरुआत में इराक और कुवैत का युद्ध हुआ। इस दौरान भारत के लगभग 1.7 लाख नागरिक खाड़ी देशों में फंस गए। इन्हें सुरक्षित भारत लाना चुनौतीपूर्ण था।
भारतीय विदेश मंत्रालय, वायु सेना और एयर इंडिया ने मिलकर Operation Airlift शुरू किया। हजारों भारतीयों को जहाजों और विमानों से सुरक्षित भारत लाया गया। यह आज भी दुनिया की सबसे बड़ी नागरिक निकासी में से एक मानी जाती है। Operation Airlift ने साबित किया कि देश की सुरक्षा और जनता की भलाई के लिए मजबूत रणनीति और संगठन बेहद जरूरी हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि विदेश नीति तभी टिकती है जब जनता का विश्वास उसके साथ हो।
अटल बिहारी वाजपेयी की नीति आज भी प्रासंगिक
2003 में जब अमेरिका ने इराक युद्ध में भारत से सैनिक भेजने को कहा, तब अटलजी ने संसद में कहा
“भारत अमेरिकी दबाव में झुककर इराक में सैनिक नहीं भेजेगा। हमारी नीति स्वतंत्र है और हम अपनी जनता की भावनाओं के खिलाफ कदम नहीं उठा सकते।”
यह लाइन आज भी मिलान की सड़कों पर गूंजती है। जनता अगर राजनयिक गलियारों की नीतियों से संतुष्ट नहीं है, तो विरोध तेज और हिंसक हो सकता है। भारत ने हमेशा संतुलन बनाया, जैसे इज़राइल के साथ रक्षा साझेदारी और फ़लस्तीन के हक़ में स्थायी समर्थन। यही बैलेंस भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग पहचान देता है।
यूरोप और भारत का दृष्टिकोण
इटली अकेला नहीं। आयरलैंड, स्पेन, नॉर्वे फ़लस्तीन को मान्यता दे चुके हैं। यूरोप की युवा पीढ़ी नैतिक सवाल उठा रही है। मिलान की यूनिवर्सिटी, फैक्ट्री और पोर्ट जहां जनता अपनी आवाज़ उठा रही है, वो सिर्फ़ इटली की समस्या नहीं है। यह संकेत है कि वैश्विक राजनीति में जनता की भावनाओं की ताकत कभी भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। यही सबक भारत ने बार-बार देखा है।
मिलान की आग सिर्फ़ इटली का मामला नहीं है। यह चेतावनी देती है कि जनता की भावनाओं को नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है। भारत के लिए सबक यही है कि विदेश नीति में संतुलन बनाए रखें। जनता की आवाज़, नैतिक दृष्टिकोण और रणनीतिक हित तीनों का मेल होना चाहिए। यदि यह संतुलन खो जाएगा, तो मिलान जैसी आग किसी भी लोकतंत्र में भड़क सकती है।
मिलान की गलियों में बच्चे नारे लगा रहे हैं, मजदूर बंदरगाह रोक रहे हैं। पढ़ते समय मन में सवाल उठता है, क्या हमारी विदेश नीति भी इतनी मजबूत और जनता के भरोसे पर आधारित है? इतिहास हमें बार-बार याद दिलाता है कि विदेश नीति सिर्फ़ राजनयिक कमरों में तय नहीं होती। फैक्ट्री गेट, रेलवे स्टेशन और यूनिवर्सिटी कैंपस इसका हिस्सा हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी की लाइन आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक है
“हमारी नीति स्वतंत्र है और हम अपनी जनता की भावनाओं के खिलाफ कदम नहीं उठा सकते।”
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