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जिनके चेहरे लाखों के मशरूम खाने से चमकते हों उन्हें मरते गरीब मजदूरों की रोटी की फिक्र कहां!

 18 May 2020

यूपी के सहारनपुर का एक परिवार होली के पांच दिन बाद गुजरात पहुंचा था, काम तलाश ही कर रहा था कि सरकार ने कोरोना संकट को देखते हुए लॉकडाउन की घोषणा कर दी, जो जहां था वहीं ठहर गया, पीएम नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील की थी कि किसी को भी खाने की दिक्कत नहीं होगी सो लोग उनकी इस बात पर चुनाव की तरह भरोसा करते हुए जहां थे वहीं रुके रहे, लेकिन वक्त बीतने के साथ उनका ये भ्रम टूटता गया कि सरकार उनकी हितैषी है। परिवार के मुखिया ने पत्नी के एक कान का झुमका बेचा और उससे साइकिल खरीदा और बच्चों को बैठाकर करीब 15 दिन में सहारनपुर वापस आ गया, 

 

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ये एक सामान्य घटना थी लेकिन मजदूरों की बेबसी की तमाम घटनाएं आप लगातार पढ़ते देखते आ रहे हैं, कहीं मजदूर ट्रेन से कट जा रहे हैं, तो कहीं सड़कों पर चलते वक्त उनके ऊपर ट्रक दौड़ जा रहे हैं, अगर इससे बच जाते हैं तो भूख और प्यास उनका प्राण ले लेती है। ऐसे में जब विपक्ष का कोई नेता इन गरीबों की मदद के लिए जमीन पर उतरता है तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण उसे ड्रामेबाजी करार देते हुए कहती हैं कि उसने पैदल चल रहे मजदूर का वक्त खराब किया, बहुत चिन्ता है तो मजदूरों के बैग उठा लेते, उनके बच्चों को गोद लेकर उनके साथ चलते। 

 

ये भाषा सिर्फ वित्त मंत्री की नहीं है बल्कि पूरी भाजपा सरकार के भीतर यही बात चल रहा है, उन्हें मजदूरों से ज्यादा अपनी प्रतिष्ठा की चिंता है, इसीलिए जब देश के हर हिस्से में मजदूर पैदल चल रहा होता है तो वह ‘6 साल बेमिसाल’ का जश्न मनाते हैं। उनका बेमिसाल शब्द इस समय बेहाल लगता है, सरकारी वादे झूठ लगते हैं। सरकारी व्यवस्थाएं फर्जी लगती हैं। सच सिर्फ इतना है कि सरकार सिर्फ उतना ही कर रही है जितने से वह अपना प्रचार कर सके, पोस्टर बनवा सके।

 

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भारत में करीब 3.5 करोड़ अंतर-राज्यीय मजदूर हैं, अगर अन्तःराज्यीय प्रवासी मजदूरों को जोड़ दे तो ये संख्या 7 करोड़ के पार पहुंच जाती है, इनमें करीब 25 फीसदी अकेले उत्तर प्रदेश व 14 फीसदी बिहार से ताल्लुक रखते हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान को जोड़ेंगे तो पाएंगे कि देश के 50 फीसदी मजदूर इन्हीं राज्यों से आते हैं। प्रोफेसर अमिताभ कुंडू के अनुसार इन मजदूरों में 50 फीसदी मजदूर ऐसे हैं जो 5-6 हजार मासिक इनकम कर पाते हैं, सभी मजदूरों का देखेंगे तो औसत 10-12 हजार के करीब बैठेगा। 

 

करीब दो महीने से इनका काम एकदम ठप्प है, अब सवाल है कि ये किस भरोसे शहर में रुके, हर माह खाते में सैलरी आने वाले लॉकडाउन का पालन कर सकते हैं लेकिन जिनके सामने रोटी का ही संकट हो जाए फिर वह कैसे रुक सकते हैं? यही सवाल जब सरकार से पूछा जाता है तो वह 20 लाख करोड़ का ऐलान कर देती है, उस ऐलान को 5 दिन वित्त मंत्री बताती हैं, पांच दिनों के बाद भी हम पाते हैं कि किसी भी मजदूर व किसान के हाथ में एक रुपया भी सीधे तौर पर नहीं आया। 

 

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सरकार कहती है कि उसे अर्थव्यवस्था की चिंता है लेकिन अर्थव्यवस्था तो डिमांड और सप्लाई के पहिए पर ही चलती है, वित्त मंत्री की पांच दिन की घोषणा में लोन बांटने की ही बात की गई जो कि सप्लाई को मदद कर सकता है पर डिमांड बढ़ाने के लिए तो लोगों के हाथ में पैसे होने चाहिए, लेकिन कोई भी घोषणा ऐसी नहीं की गई। 

 

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बड़ा सवाल यही है कि जो सरकार चुनाव के वक्त लोगों के लिए नाश्ता-पानी व खाना की व्यवस्था करते हुए उन्हें साधनों में भरकर 200 किमी दूर रैली स्थल पर नारे लगवाने ले जाती है वह अब इतनी असहज क्यों हो गई है? जो पार्टी चुनाव के वक्त मुसलमानों का डर दिखाकर लोगों को हिन्दू बना देती है और उनका वोट ले लेती है उन्हें मजदूर अब हिन्दू क्यों नहीं लग रहा है? क्या सिर्फ गेंहू चावल से ही जरूरत पूरी की जा सकती है? ऐसे ही अनगिनत सवाल उस सत्ता से है जिसके सिंहासन पर बैठे व्यक्ति का चेहरा 80 हजार रुपए के ताइवानी मशरूम खाने से चमक रहा है।