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सिंधिया के फैसलों में छिपा है कांग्रेस के लिए सबक!

 31 Mar 2020

मध्य प्रदेश की राजनीति में कई दिनों से उथलपुथल मची हुई है, कभी विधायकों के गायब होने की खबर आती है, कभी उन्हीं विधायकों की खरीद-फरोख्त की अफवाहें सुर्खियां बनी रहती थीं, इन सबके बीच कांग्रेस को अपूरणीय झटका पार्टी के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिया, पिछले 18 वर्षों से राज्य में कांग्रेस का परचम बुलंद रखने वाले सिंधिया अचानक पार्टी से इस्तीफ़ा देकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर लेते हैं. सिंधिया के नक्शे कदम पर चलते हुए कमलनाथ सरकार के 22 विधायक भी इस्तीफ़ा दे देते हैं जिससे कांग्रेस की सत्ता पर ग्रहण लगने लगता है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सब अचानक नहीं हुआ इसकी पटकथा बहुत पहले से लिखी जा रही थी.

राज्यों में जनता का भरोसा तो जीता लेकिन नेताओं को एकजुट रखने में विफल रही है कांग्रेस

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार पर सियासी संकट का दौर 13 दिसंबर 2018 से ही शुरू हो गया था, 12 दिसंबर को एमपी विधानसभा का चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस का सत्ता से वनवास खत्म तो हो गया था लेकिन पार्टी आला कमान के सामने बड़ी मुसीबत मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर थी. पूरे 15 साल बाद कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने में कमोबेश सभी नेताओं की भूमिका अहम रही थी, लेकिन सबसे ज्यादा श्रेय प्रदेश के कुछ कद्दावर नेताओं को दिया गया था जिसमें कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सबसे ऊपर था. दोनों नेताओं के समर्थकों ने पार्टी कार्यालय के बाहर अपने-अपने नेताओं को सीएम बनवाने के लिए पूरा दमखम लगा दिया था. उसी दिन से एमपी में कांग्रेस सरकार पर संकट की सुगबुगाहट होने लगी थी. उसके बाद कांग्रेस ने 13 दिसंबर 2018 को कमलनाथ को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया था और सिंधिया के सामने डिप्टी सीएम का पद रखा था, जिसे सिंधिया ने नकार दिया था. उसी दिन से राजनीतिक उथलपुथल की पटकथा लिखी जाने लगी थी. 1 साल 3 महीने के दौरान कमलनाथ सरकार को कई बार उतार–चढ़ाव का सामना करना पड़ा. विपक्षी नेता तो पलटवार कर ही रहे थे, लेकिन पार्टी के कई विधायक-मंत्री अपनी ही सरकार के खिलाफ ख़ड़े हो जाते थे. कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान जनता से खूब लोक-लुभावने वादे किये थे लेकिन सत्ता में आने के बाद खाली खजाने ने सरकार की नींद उड़ा दी थी. ऊपर से केंद्र ने भी कमलनाथ सरकार के हिस्से से करीब 14 हजार करोड़ की कटौती कर दी थी और राजकीय कोष में आने वाली राशि भी निर्धारित टारगेट से काफी कम रह गई थी.


इन सभी विषमताओं के बीच किसानों की कर्जमाफी कांग्रेस सरकार के लिए सिरदर्द का कारण बनती जा रही थी, जनता और विपक्ष दोनों राहुल गांधी के बयान को याद दिला रहे थे जिसमें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दावा किया था अगर कर्जमाफी 10 दिनों के भीतर नहीं की गई तो वो राज्य के मुख्यमंत्री को तुरंत बदल देंगे.

सिंधिया के बगावत की पटकथा

मुख्यमंत्री ना बन पाने की कसक सिंधिया के मन में जैसे घर कर गई हो, लगातार अपनी सरकार के खिलाफ बयानयाजी कर सिंधिया जैसे विपक्ष को कमलनाथ सरकार के कमजोर नब्ज़ पर हमला करने का खुला सिंधिया निमंत्रण दे रहे थे. अचानक 26 नवंबर  को कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने ट्विटर बायो से कांग्रेस का नाम हटाकर समाजसेवी और क्रिकेट प्रेमी लिख दिया था, सिंधिया ने यह बदलाव कर अपनी नाराज़गी खुले आम पूरी दुनिया के सामने रख दिया था.

धारा 370 के मुद्दे पर पार्टी लाइन से हटकर किया था भाजपा का समर्थन
5 अगस्त 2019 को भारतीय जनता पार्टी द्वारा जम्मू कश्मीर से धारा 370 और आर्टिकल 35(A) हटाने के बाद कांग्रेस बेचैन हो गई थी, संसद भवन में कमजोर होने के बावजूद खूब शोर-शराबा किया था. जहां एक तरफ पूरा कांग्रेसी खेमा भाजपा के इस फैसले का सर्वसम्मति से मुखालफत कर रही था, वहीं सिंधिया ने पार्टी लाइन से हटकर इस फैसले का समर्थन किया और राष्ट्रवादी चेहरा जगजाहिर कर दिया था. तभी से माना जाने लगा था कि सिंधिया कभी भी पार्टी को झटका दे सकते हैं.

 

मर्ज़ी के खिलाफ पार्टी ने लोकसभा चुनाव में दी थी खाई में झोंकने जैसी जिम्मेदारी

पिछले लोकसभा चुनाव प्रचार में सिंधिया की मर्जी के खिलाफ उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया गया था जहां पार्टी की कोई खास जनाधार नहीं है. नतीजन चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद सिंधिया ने अपना इस्तीफा दे दिया था लेकिन पार्टी ने उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था.


शुरू हुआ शक्ति प्रदर्शन का दौर
पिछले महीने भोपाल यात्रा के दौरान सिंधिया ने अपना शक्ति प्रदर्शन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. युवाओं, किसानों, महिलाओं, बुजुर्गों से मुलाकात कर उन्हें बेहतरी का आश्वासन दे रहे थे. सिंधिया गुट के मंत्री ने सिंधिया के स्वागत में डिप्लोमेसी डिनर का आयोजन किया था लेकिन वहां भी कांग्रेसी नेताओं की गुटबाजी साफ दिखी क्योंकि दिग्विजय और कमलनाथ ने वहां भी सिंधिया से दूरी बना रखी थी. हाल में सिंधिया ने सार्वजनिक तौर पर ऐलान कर दिया कि अगर वचन पत्र के वादे पूरे नहीं हुए तब वो सड़कों पर उतर जाएंगे, हालांकि उसपर विचार करने के बजाय कमलनाथ ने बड़ी बेबाकी से कह दिया कि वो सड़क पर उतर जाएं.


अपने वर्चस्व को मजबूत करने में जुट गए थे सिंधिया
पिछले 6 महीने से सिंधिया प्रदेश की राजनीति में फिर से सक्रिय हो गए, लगातार राज्य के अलग-अलग हिस्सों में सभा करने लगे, अपने वर्चस्व को मजबूत करने में जुटे जाते हैं थे जिसे कांग्रेसी खेमा नजरअंदाज कर रहा था. सिंधिया ने चंबल के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ को कई पत्र लिखे, पीड़ितों की समस्याओं, इलाके की बदहाल सड़कों, जर्जर बिजली-पानी की व्यवस्था की ओर सरकार का ध्यान खींचने की कोशिश की लेकिन कमलनाथ ने किसी भी पत्र का जवाब या प्रदेश का मुखिया होने के नाते खुद जाकर उन इलाकों का जायजा लेना उचित नहीं समझा.

राज्यसभा जाने की कतार में भी खुद को काफी पीछे देख रहे थे सिंधिया
मुख्यमंत्री ना बन पाने के बाद सिंधिया लगातार हाशिए पर जा रहे थे, प्रदेश अध्यक्ष पद मिलने की राह भी कठिन दिखाई दे रही था क्योंकि हमेशा की तरह दिग्विजय उनके सामने खड़े नजर आते थे. पार्टी से आस खो चुके सिंधिया को आखरी उम्मीद थी कि उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया जा सकता है लेकिन वहां भी सिर्फ निराशा ही मिलती दिख रही थी, क्योंकि कांग्रेस के पास एमपी कोटे से राज्यसभा की सिर्फ 1 सीट है और उसमें कई दिग्गज नेताओं के नाम शामिल हैं. समय-समय पर कांग्रेस के कुछ मंत्री प्रियंका गांधी को एमपी कोटे से राज्यसभा भेजने की मांग उठा रहे थे जिससे सिंधिया की चिंता और बढ़ने लगी थी.

सोनिया का डर और सिंधिया का बलिदान
द प्रिंट की एक रिपोर्ट के अनुसार ज्योतिरादित्य सिंधिया की नाराज़गी सिर्फ कमलनाथ और दिग्विजय से नहीं बल्कि सोनिया और राहुल गांधी से भी है क्योंकि लगातार सिंधिया के वर्चस्व को इन सभी नेताओं द्वारा कम आंका जा रहा था. रिपोर्ट के अनुसार सिंधिया को राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था लेकिन चुनाव जीतने के बाद कमलनाथ के नाम पर मुहर लगा दी थी. माना यह भी जा रहा कि सोनिया गांधी किसी युवा नेता को नहीं उभरने देना चाहती हैं क्योंकि उनके मन में यह डर बसा हुआ है कि कोई दूसरा युवा नेता उनके बेटे को पछाड़ कर उनकी विरासत में सेंध लगा देगा. इसी डर की वजह से सिंधिया की लोकसभा में कांग्रेस की तरफ से 2 साल से रिक्त पड़ी डिप्टी लीडर पद पर नियुक्ति भी अटकी हुई है.

 

इन सब के बीच लगातार खबरें यह भी आ रहीं थी कि सिंधिया पिछले 45 ​​​​​​​दिनों से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के संपर्क में थे और सूत्रों का यह भी मानना है कि दोनों नेताओं की लगातार मुलाकात भी हो रही थी.


मध्य प्रदेश में सियासी उठापटक और सिंधिया समेत 22 विधायकों का इस्तीफा

सूबे की राजनीति में करीब पिछले 15-20 दिनों से सियासी घमासान मचा हुआ है, दिग्विजय लगातार भाजपा पर कांग्रेस विधायकों के खरीद-फरोख्त का आरोप लगा रहे थे और अचानक कांग्रेस विधायकों के गुरूग्राम के आईटीसी होटल में बंदी बनाए जाने की खबरें सामने आने लगीं. कांग्रेस नेता और दिग्विजय के बेटे लक्ष्मण सिंह ने कमलनाथ सरकार में मंत्री जीतू पटवारी के साथ मिलकर बसपा विधायक को होटल से निकाला, इस दौरान कांग्रेस नेताओं की प्रशासन से मामूली झड़प की खबर आई थी. इसके बाद भी कमलनाथ सरकार के कई विधायकों के बंदी बनाए जाने के के अफ़वाह चरम पर थे. धीरे-धीरे कथित रूप से बंदी विधायक मध्य प्रदेश की धरती पर आने लगते हैं, मुख्यमंत्री से मुलाकात करते हैं और बंदक बनाए जाने की खबरों कई लोग आलोचना भी करते हैं.
इधर सभी विधायक कमलनाथ को आश्वस्त करतें हैं कि वो पूरे मन से सरकार के साथ थे, हैं और आगे भी रहेंगे लेकिन दिग्विजय का भाजपा पर हार्स ट्रेडिंग का आरोप लगाने का दौर खत्म ही नहीं हो रहा था. इस हाई वोल्टेज सियासी घटनाक्रम के बीच भाजपा के विधायक राज्यपाल औऱ गृहमंत्री से जान को खतरा का हवाला देकर सुरक्षा की मांग करते हैं और इन सबसे कांग्रेस को लगता है कि प्रदेश में सब ऑल इज वेल हो गया है.


सिंधिया की चुप्पी बयां कर रही थी पूरी कहानी

इस पूरे घटनाक्रम में एक बात किसी को नहीं खटकती है कि कांग्रेस का हर विधायक मंत्री अपने-अपने स्तर से सरकार को स्थिर करने की कोशिश में जुटा दिखाई देता है लेकिन प्रदेश के कद्दावर नेताओं में से एक ज्योतिरादित्य सिंधिया पूरी घटनाक्रम पर चुप्पी साधे दिखाई देते हैं और अचानक कई दिनों से लिखी जा रही पटकथा का स्क्रीनप्ले करने निकल जाते हैं. सोमवार यानि 9 मार्च की रात अचानक कमलनाथ सरकार के 20 कैबिनेट ​​​​​​​मंत्री अपना इस्तीफ़ा सौंप देते हैं जिसे कमलनाथ स्वीकार भी कर लेते हैं लेकिन उनकी बेचैनी तब बढ़ जाती है जब सिंधिया गुट के 6 मंत्री उस बैठक से नदारद रहते हैं. कमलनाथ उनसे संपर्क करने की कोशिश करते हैं लेकिन इस बार विफलता उनके हाथ लग गई थी.


सिंधिया खेमे के नेताओं से संपर्क टूटने के बाद जगी कांग्रेस
जैसे ही खबर आने लगती है कि सिंधिया समर्थक 12 विधायकों और 6 मंत्रियों को बेंगलूरू शिफ्ट किया गया है और विमान भी भाजपा ने ही बुक कराया था. फिर अचानक दिल्ली पहुंचकर शिवराज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह समेत कई अन्य से मुलाकात करते हैं.

सिंधिया की मोदी-शाह के साथ बैठक से उड़ी कांग्रेस की नींद

ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा आलाकमान से मुलाकात का दौर आखिरकार शुरू होता है, जो अमित शाह, शिवराज सिंह, जेपी नड्डा से होकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर खत्म हो जाता है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सिंधिया और पीएम की बैठक में सिंधिया को राज्यसभा सदस्य और मोदी सरकार के कैबिनेट में जगह देने की बात को मंजूर किया गया है.


शुरू हुआ इस्तीफों का दौर

10 मार्च को 12:10 बजे सिंधिया ने अपने ट्विटर हैंडल से इस्तीफे की जनकारी दे दी, ग़ौर करने वाली बात है कि इस्तीफे पर 9 मार्च की तारीख पड़ी हुई है. सिंधिया के इस्तीफे के बाद वेणुगोपाल ने बताया कि सिंधिया को पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से बरखास्त किया जा रहा है. इसके कुछ मिनटों के बाद ही बेंगलूरू से 19 विधायकों ने अपना इस्तीफा सौंप दिया, इसी घटनाक्रम में कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक बिसाहू लाल सिंह जो कई दिनों तक गायब भी रहे थे, शिवराज की उपस्थिति में कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने का ऐलान कर दिया. धीरे-धीरे कुल 22 विधायकों ने इस्तीफा दिया है जिसकी वजह से कमलनाथ सरकार के पास अब सिर्फ 92 सदस्य ही बचे हैं. कमलनाथ सरकार के अल्पमत में आने की वजह से अब शिवराज का सत्ता में वापसी का रास्ता खुल गया है क्योंकि 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा में अब सिर्फ 206 सदस्य बचे हैं और भाजपा के पास पहले से ही 107 सदस्य हैं वहीं कांग्रेस का आंकड़ा​​​​​​​ 92 पर आकर अटक गया है.


इस्तीफे में छलका सिंधिया का दर्द

सिंधिया के इस्तीफे में पार्टी के प्रति नाराज़गी और दर्द साफ झलकता नजर आ रहा है, पहली ही लाईन में सिंधिया ने लिखा कि पिछले 18 साल से पार्टी के सदस्य रहे हैं लेकिन अब आगे बढ़ने का समय आ गया है और पार्टी से विदाई लेने का विचार 1 साल पहले से ही बन रहा था.
उन्होंने आगे लिखा कि शुरू से ही उनका उद्देश्य जनता की सेवा करना रहा है लेकिन अब इस वो पार्टी में रहकर और नहीं कर पा रहे. अपने लोगों की आशा और महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए नए राजनीतिक पारी की शूरुवात करने के बारे में सोचा है. पत्र के आखरी भाग में सिंधिया ने पार्टी के सभी नेताओं का आभार व्यक्त किया और देश सेवा का मौका देने कि लिए सभी को धन्यवाद प्रस्ताव दिया.


नड्डा के नेतृत्व में मोदीमय हुए सिंधिया, बताया पार्टी छोड़ने का कारण

कांग्रेस से इस्तीफ़ा देने के बाद ज्योतिरादित्य ने भाजपा की सदस्यता लेकर सभी प्रकार के राजनीतिक अटकलों को विराम लगा दिया. भाजपा ने भव्य तरीके से सिंधिया का स्वागत किया. भाजपा की सदस्यता लेने के बाद सिंधिया ने कांग्रेस को एक बड़ा संदेश दिया. सिंधिया ने भारी मन से कहा कि उनका लक्ष्य सिर्फ जनसेवा है इसीलिए उन्होंने राजनीति को माध्यम बनाया. उन्होंने बताया कि दो तारीख उनके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण हैं पहला 30 सितंबर 2001 जब उन्होंने अपने पिता माधवराव सिंधिया को खोया था, दूसरा 10 मार्च 202​​​​​​​​​​​​​​0 का दिन, जब उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के लिए एक नया रास्ता चुनने का फैसला किया.

सिंधिया ने बड़े भारी मन से कहा कि उनका मन आज दुखी भी और व्यथित भी क्योंकि कांग्रेस जैसी पार्टी पहले थी वो आज नहीं रही और उसके तीन मुख्य कारण भी गिनाए. पहला- पार्टी का वास्तविकता से इनकार करना, दूसरा- नई विचारधारा और नेतृत्व को मान्यता नहीं मिलना. तीसरा- पार्टी जिन सपनों को लेकर चुनाव लड़ी थी, उनको नजरअंदाज करना. सिंधिया ने कहा कि 2018 में जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में आई तो उनके मन में राज्य के विकास को लेकर एक सपना था, जो महज 18 महीनों के अंदर ही बिखर गया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस में रहकर समाजसेवा संभव नहीं है क्योंकि कांग्रेस सरकार किसानों की कर्जमाफी, उन्हें मुआवजा देने, युवाओं को रोजगार देने के बजाय भ्रष्टाचार को बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तारीफों के पुल बांध दिए, बताया कि किय तरह पीएम जनता के प्रति वचनबद्ध होकर काम कर रहे हैं. सिंधिया ने पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत भाजपा के सभी कार्यकर्ताओं को धन्यवाद दिया खासकर मोदी जी के प्रति आभार व्यक्त किया किया कि उन्होंने जनसेवा के लिए एक मंच प्रदान किया है.


कांग्रेस के लिए सबक
सिंधिया के इस्तीफे से कांग्रेस के तगड़ा झटका तो लगा ही था लेकिन भाजपा में शामिल होने के बाद इसे अपूरणीय क्षति माना जा रहा है क्योंकि कांग्रेस के सामने अब दो राज खड़े हो गए हैं पहला महाराज यानि ज्योतिरादित्य सिंधिया दूसरा एमपी पर 15 साल राज करने वाले शिवराज सिंह. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार कांग्रेस को सिंधिया के इस्तीफे पर विचार विमर्श करना चाहिए था, उनको बुलाकर बात-चीत करनी चाहिए थी लेकिन बड़े ही गैर-जिम्मेदाराना तरीके से इतने बड़े नेता को पार्टी से निकालने का आदेश जारी कर दिया. उसके तुरंत बाद ही कांग्रेस नेता सिंधिया को गद्दार और मौका परस्त करार देने लगे. सिंधिया और विधायकों के सामूहिक इस्तीफे की वजह से कांग्रेस एक बहुत बड़ा राज्य खोने जा रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिंधिया जैसे नेता यदि विपक्षी दल के नेताओं से मुलाकात कर रहे थे तो यह पार्टी की सबसे बड़ी विफलता है. कांग्रेस का अस्तित्व राजनीतिक नक्शे से तो छोटा होता ही जा रहा हैं, वहीं अपने नेताओं की काबिलियत को भुनाने में कांग्रेस असमर्थ साबित होती नजर आ रही है. कांग्रेस का यह रवैया पार्टी के साथ भारतीय राजनीति के लिए एक नुकसानदेह साबित हो सकती है क्योंकि दशकों तक राज करने के बाद अब कांग्रेस मजबूत विपक्ष तक बनने में असहाय महसूस कर रही है.