चुनाव चाहे लोकसभा का हो, विधानसभा का, या फिर स्थानीय निकाय का, इनमें जातीय समीकरणों का बहुत बड़ा महत्व होता है। तमाम राजनीतिक दल अपनी चुनावी रणनीति में जाति आधारित समीकरणों को ध्यान में रखते हुए टिकटों का फैसला करते हैं। दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनाव में भी यह जातीय समीकरण साफ देखा जा सकता है। दिल्ली में अपनी सरकार बनाने के लिए बीजेपी, आम आदमी पार्टी (AAP), और कांग्रेस पूरी ताकत झोंक रही हैं। इन तीनों दलों ने किस जाति को कितने टिकट दिए हैं, यह समझना बेहद दिलचस्प है।
सवर्ण जातियों का वोट बैंक सबसे बड़ा
दिल्ली की राजनीति में सवर्ण या ऊंची जातियों का वोट बैंक सबसे बड़ा है। राजनीतिक दलों की जानकारी के मुताबिक, दिल्ली में सामान्य जातियों का वोट प्रतिशत 35 से 40% है, जिसमें ब्राह्मण समुदाय सबसे बड़ा हिस्सा रखता है। इसके बाद ओबीसी जातियों का वोट बैंक आता है, जो करीब 30% है। इनमें जाट और गुर्जर जाति विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं, और ओबीसी का यह बड़ा हिस्सा इन जातियों से आता है। चुनावों में प्रतिनिधित्व की बात करें तो इसमें सवर्ण जातियों का दबदबा देखा जाता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों द्वारा घोषित किए गए उम्मीदवारों में से 45% सवर्ण जातियों से हैं। आम आदमी पार्टी इस मामले में बीजेपी से आगे निकल गई है, और उसने 48% टिकट सवर्ण जातियों को दिए हैं। वहीं, कांग्रेस ने 35% टिकट सवर्ण जातियों से संबंधित नेताओं को उतारा है।
सवर्ण जातियों में ब्राह्मणों को उनकी जनसंख्या के हिसाब से अधिक टिकट मिले हैं। कांग्रेस ने 17% टिकट ब्राह्मणों को दिए हैं, जबकि बीजेपी ने 16% और आम आदमी पार्टी ने 19% ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।
बीजेपी ने वैश्य समुदाय को सबसे अधिक 17% टिकट दिए हैं, जबकि आम आदमी पार्टी ने 13% और कांग्रेस ने 10% वैश्य उम्मीदवारों को मौका दिया है। राजपूत समुदाय को आम आदमी पार्टी ने 10% टिकट दिए हैं, बीजेपी ने 7% टिकट दिए हैं, जबकि कांग्रेस ने सिर्फ एक राजपूत उम्मीदवार को मैदान में उतारा है।
आंकड़ों की बात
त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले विधानसभा चुनावों में भी सवर्ण जातियों का वर्चस्व देखा गया था। मौजूदा दिल्ली विधानसभा में 50% विधायक सवर्ण जातियों से आते हैं। आम आदमी पार्टी के 40% विधायक सवर्ण जातियों से हैं, जबकि बीजेपी के 6 विधायक इसी समुदाय से हैं। कांग्रेस का यहां कोई भी विधायक नहीं है। कांग्रेस ने ओबीसी और अन्य मध्यवर्ती जातियों को सबसे अधिक 30% टिकट दिए हैं। आम आदमी पार्टी ने इनमें 25% टिकट दिए हैं, जबकि बीजेपी ने 20% टिकट ओबीसी वर्ग से संबंधित नेताओं को दिए हैं। दिल्ली की राजनीति में जाट और गुर्जर समुदाय की भागीदारी लगातार घटती जा रही है। 2008 से 2020 के बीच जाट समुदाय का प्रतिनिधित्व 19% से 13% और गुर्जर समुदाय का प्रतिनिधित्व 11% से 6% हो गया है। हालांकि, इन जातियों का दिल्ली की राजनीति में हमेशा से दबदबा रहा है।
मुस्लिम और सिख समुदाय की भागीदारी
दिल्ली में मुस्लिम समुदाय का भी अच्छा-खासा प्रभाव है। इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सबसे अधिक 10% मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि आम आदमी पार्टी ने 7% मुस्लिम नेताओं को प्रत्याशी बनाया है। बीजेपी ने इस बार किसी भी मुस्लिम नेता को टिकट नहीं दिया।
सिख समुदाय की भागीदारी की बात करें तो बीजेपी ने 5%, आम आदमी पार्टी ने 6% और कांग्रेस ने 7% टिकट सिख नेताओं को दिए हैं। दिल्ली की राजनीति में सिख समुदाय का प्रभाव 1993 में 3% से बढ़कर 2013 में 13% हुआ था, लेकिन 2020 में यह फिर से घटकर 3% हो गया है।
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