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Bangladesh: आयोग की संविधान से धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद हटाने की सिफारिश
04 Feb 2026
बांग्लादेश के संविधान सुधार आयोग ने बुधवार को अपनी रिपोर्ट अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस को सौंप दी है। इस रिपोर्ट में बांग्लादेश के मौजूदा संविधान से धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और राष्ट्रवाद जैसे महत्वपूर्ण मौलिक सिद्धांतों को हटाने का प्रस्ताव दिया गया है। ज्ञात हो कि शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया था, जिसने इस संविधान सुधार आयोग को नियुक्त किया था।
रिपोर्ट में आयोग ने बांग्लादेश के लिए द्विसदनीय संसद प्रणाली का भी प्रस्ताव रखा है, जिसमें एक निचला सदन (नेशनल असेंबली) और एक ऊपरी सदन (सीनेट) होगा। इस नई व्यवस्था के तहत, निचले सदन में 105 सीटें और ऊपरी सदन में 400 सीटें होंगी। दोनों सदनों का कार्यकाल चार वर्षों का होगा, जबकि वर्तमान में यह पांच वर्षों का है। यह बदलाव बांग्लादेश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
आयोग ने बांग्लादेश के संविधान में राज्य नीति के चार प्रमुख सिद्धांतों को भी जोड़ा है, जिनमें समानता, मानव गरिमा, सामाजिक न्याय, बहुलवाद और लोकतंत्र शामिल हैं। यह प्रस्तावना 1971 के स्वतंत्रता संग्राम और 2024 के जन आंदोलन के आदर्शों पर आधारित होगी, जो भविष्य में देश में स्थिरता और समृद्धि लाने का एक मार्ग प्रशस्त करेगी।
इसके अतिरिक्त, आयोग ने प्रधानमंत्री के कार्यकाल को दो कार्यकालों तक सीमित करने का सुझाव भी दिया है। आयोग का मानना है कि पिछले 16 वर्षों में बांग्लादेश में ‘तानाशाही’ की एक प्रमुख वजह यह रही है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में शक्ति का केंद्रीकरण और संस्थागत शक्ति संतुलन का अभाव था। ऐसे में यह बदलाव देश में राजनीतिक स्थिरता को सुनिश्चित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने में सहायक होगा।
रिपोर्ट में आयोग ने एक नए संविधानिक निकाय ‘राष्ट्रीय संविधानिक परिषद’ के गठन का भी प्रस्ताव दिया है, जो राज्य की तीन प्रमुख शाखाओं—कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका—के बीच संतुलन स्थापित करेगी। इस परिषद में राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, दोनों सदनों के अध्यक्ष, विपक्ष के डिप्टी स्पीकर और विभिन्न दलों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह निकाय नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करेगा, जिससे भविष्य में लोकतांत्रिक संस्थानों की प्रभावी कार्यवाही को और सुदृढ़ किया जा सकेगा।
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