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"संसद का मूल कार्य सरकार को जवाबदेह बनाना", उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का बयान

 10 Mar 2026

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को वरिष्ठ अधिवक्ता के एस चौहान की किताब "Parliament: Powers, Functions & Privileges; A Comparative Constitutional Perspective" के शुभारंभ के अवसर पर संसद के महत्व और उसकी कार्यप्रणाली पर गहरे विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए संसद का प्रभावी और कार्यात्मक होना अनिवार्य है, और यदि संसद इसी तरह बाधित होती रही और उसकी भूमिका अप्रासंगिक हो गई, तो यह देश में सार्वजनिक अशांति का कारण बन सकती है।


संसद का महत्व और लोकतंत्र पर प्रभाव


धनखड़ ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे पुराना और जीवंत लोकतंत्र है, जिसे लोकतंत्र की जननी के रूप में पहचाना जाता है। भारत में अन्य देशों की तुलना में संवैधानिक रूप से अधिक संरचित लोकतंत्र है। उनके अनुसार, संसद का पहला कार्य सरकार को जवाबदेह बनाना है, और यह कार्य संवाद, बहस और चर्चा के माध्यम से ही संभव हो सकता है। अगर संसद अपनी यह भूमिका सही से निभाने में विफल रहती है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरे का संकेत है।

विकास और जनता की आकांक्षाएँ


उपराष्ट्रपति ने यह भी उल्लेख किया कि पिछले कुछ वर्षों में लोग विकास का स्वाद चख चुके हैं, और अब उनके भीतर अधिक विकास की इच्छा जागी है। उन्होंने कहा कि बैंकिंग समावेशन, स्वच्छता, किफायती आवास, गैस कनेक्शन, सड़क संपर्क और शिक्षा जैसी योजनाओं ने समाज में सकारात्मक बदलाव लाए हैं। डिजिटलीकरण के कारण पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र का निर्माण हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप देश में आकांक्षाओं का माहौल बन गया है। उनका मानना है कि यह आकांक्षापूर्ण माहौल संसद के माध्यम से सही नीतियों के विकास के द्वारा ही पूरी हो सकता है, और यह तभी संभव है जब संसद सक्रिय रूप से काम करे।

निर्वाचन प्रणाली और संसद की भूमिका


धनखड़ ने संसद को लोगों का प्रतिनिधि मंच बताया और कहा कि यह सबसे पवित्र मंच है, जहां विभिन्न विचार और दृष्टिकोण आते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि निर्वाचन प्रणाली संसद के प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता को निर्धारित करती है, और यदि संसद अपनी शक्तियों का उपयोग नहीं करती है, तो यह सब एक वैक्यूम में बदल जाएगा। ऐसे में लोग आंदोलन करेंगे, और संविधान की असंगत स्थितियों को समतल करने का एकमात्र मंच संसद ही हो सकता है।

चुनौतियों को अवसरों में बदलने की आवश्यकता


उपराष्ट्रपति ने यह भी कहा कि संसद का कार्य समय से आगे की सोच रखना है। वर्तमान समय में, जहां तकनीकी परिवर्तन, औद्योगिक क्रांति, और विध्वंसकारी तकनीकें तेजी से बदल रही हैं, संसद को इन चुनौतियों से निपटने के लिए नवीन नीतियाँ विकसित करनी होंगी। वे मानते हैं कि संसद एक सूचनाओं के आदान-प्रदान का मंच नहीं है, बल्कि यह समस्या समाधान का मंच है। हमें चुनौतियों को अवसरों में बदलने के लिए एक प्रभावी प्रणाली विकसित करनी होगी, ताकि हम प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ सकें।  

धनखड़ ने अंत में कहा कि भारत ने वैश्विक शक्ति के रूप में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है और यह सदी भारत की है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ असंगत स्थितियां हैं, जिन्हें समतल करने का एकमात्र स्थान संसद है। अगर संसद सक्रिय रूप से काम करती है, तो हम इन चुनौतियों का सामना कर सकते हैं और भारत को एक मजबूत और प्रगतिशील राष्ट्र बना सकते हैं।

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