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SC से ग़ुहार IAS, IPS के बच्चों को न मिले SC-ST ‘आरक्षण’ का फायदा, कोर्ट- 'संसद का काम, खारिज़!'

 06 Apr 2026

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें मांग की गई थी कि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के बच्चों को अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। यह याचिका मध्य प्रदेश के संतोष मालवीय ने दायर की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से इंकार कर दिया और कहा कि इस तरह के मामलों में निर्णय लेने का अधिकार केवल संसद को है, न्यायालय को नहीं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसे आरक्षण मिलना चाहिए और किसे नहीं, यह संसद का कार्य है, और इस बारे में किसी तरह का निर्णय केवल संसद द्वारा ही लिया जा सकता है। यह याचिका एक पहले की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से संबंधित थी, जिसमें अदालत ने यह राय व्यक्त की थी कि अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान होना चाहिए। 


इस टिप्पणी के अनुसार, यदि किसी दलित या आदिवासी परिवार का कोई सदस्य आईएएस या आईपीएस जैसे उच्च पदों पर है, तो उसके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। अदालत ने यह कहा था कि अगर कोई परिवार समाज की मुख्यधारा में आ चुका है और उसने उच्च पदों को प्राप्त कर लिया है, तो अब उन परिवारों के बच्चों के स्थान पर उन बच्चों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो अभी तक वंचित हैं और मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए हैं। मालवीय की याचिका पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में दायर की गई थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया था और मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की सलाह दी थी। 

उच्च न्यायालय ने कहा था कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले का पालन करना आवश्यक है, जिसमें क्रीमी लेयर के प्रावधान पर विचार किया गया था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के उस अगस्त के फैसले में सात जजों की बेंच शामिल थी, जिसमें यह तय किया गया था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान होना चाहिए। 

इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि जिन परिवारों के सदस्य आईएएस और आईपीएस जैसे उच्च पदों पर कार्यरत हैं, उन्हें आरक्षण से बाहर रखा जाए, क्योंकि वे अब समाज की मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं। इस प्रकार की टिप्पणी और याचिकाओं के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर कोई आदेश देने से इनकार कर दिया है और इसे संसद के अधिकार क्षेत्र में छोड़ दिया है। अदालत ने यह भी कहा कि संसद इस मुद्दे पर कानून बना सकती है, लेकिन न्यायालय के पास इस पर कोई निर्णय देने का अधिकार नहीं है।

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