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Uttrakhand: वन विभाग की कंट्रोल बर्निंग तकनीक बन रही जंगलों के अस्तित्व का ख़तरा, विशेषज्ञों ‘बंद’ के समर्थन में

 09 Apr 2026

जंगलों की आग को नियंत्रित करने के उद्देश्य से अंग्रेजों के जमाने से अपनाई जा रही कंट्रोल बर्निंग (नियंत्रित आग) की तकनीक अब जंगलों और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे का कारण बन रही है। यह तकनीक हर साल वन विभाग द्वारा फायर सीजन से पहले जंगलों में लगाई जाती है, ताकि प्राकृतिक आग से पहले सूखी घास और पत्तियां जलकर खत्म हो जाएं, लेकिन अब यह तकनीक परिणामस्वरूप नुकसानदायक साबित हो रही है। वन विभाग जनवरी महीने से ही जंगलों में आग लगाना शुरू कर देता है, और इस आग को नियंत्रित आग के तौर पर लगाया जाता है, ताकि जंगलों की सुरक्षा की जा सके। लेकिन अनुमान है कि हर साल वनाग्नि से होने वाले नुकसान का लगभग 20 फीसदी हिस्सा कंट्रोल बर्निंग की वजह से होता है। 


विभागीय आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल जितनी भी वनाग्नि की घटनाएं हुईं, उनमें लगभग 4 फीसदी आग नियंत्रित जलाने के कारण थी। अब इस मुद्दे को लेकर विभाग के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं, और पर्यावरणीय संगठनों ने इस तकनीक को बंद करने की मांग की है। पर्यावरण प्रेमी और विशेषज्ञ इस पुरानी तकनीक के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। पर्यावरणविद् अनिल कक्कड़ ने कहा कि यह एक पुरानी और अप्रभावी तकनीक है, जिसका इस्तेमाल अब केवल नुकसान कर रहा है, न कि जंगलों की रक्षा। 

वे जल्द ही इस मामले को लेकर एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का इरादा रखते हैं। इसके अलावा, दून विश्वविद्यालय के पर्यावरण वैज्ञानिक प्रोफेसर विजय श्रीधर का कहना है कि इस प्रक्रिया से पर्यावरण को काफी नुकसान हो रहा है, क्योंकि इसमें वातावरण में ब्लैक कार्बन जैसे घातक कणों का स्तर बढ़ जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। वहीं, एपीसीसीएफ वनाग्नि प्रबंधन निशांत वर्मा का कहना है कि कंट्रोल बर्निंग का उद्देश्य जंगलों में जलने योग्य सामग्री (फ्यूल लोड) को कम करना है, ताकि प्राकृतिक आग के फैलने की संभावना कम हो सके। लेकिन अब इस प्रक्रिया से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए चीड़ के पिरूल से ब्रिकेट बनाने और पत्तियों से खाद तैयार करने जैसी अन्य वैकल्पिक उपायों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

 2024 में वनाग्नि के कारण करीब 2,000 हेक्टेयर जंगल को नुकसान हुआ, जबकि पिछले साल राज्य में 20,000 हेक्टेयर जंगलों में कंट्रोल बर्निंग की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में पेड़, पौधे, झाड़ियां, सूखी लकड़ियां और अन्य वन संपदा का नुकसान हुआ। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल लगभग सात हजार किलोमीटर की फायर लाइन पर करीब 12,000 हेक्टेयर क्षेत्र में कंट्रोल बर्निंग की गई, जिसके कारण पर्यावरण को भी बड़ा नुकसान हुआ। इस स्थिति में यदि स्थिति पर काबू नहीं पाया गया, तो आने वाले समय में इससे होने वाले पर्यावरणीय और जैविक नुकसान को दुरुस्त करना मुश्किल हो सकता है।

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