केरल में इन दिनों सत्ताधारी सीपीआईएम और विपक्षी भाजपा के बीच सनातन धर्म और श्री नारायण गुरु को लेकर गंभीर राजनीतिक विवाद छिड़ चुका है। यह विवाद तब और बढ़ गया जब केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने मंगलवार को बयान दिया, जिसमें उन्होंने श्री नारायण गुरु को सनातन धर्म के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयासों के खिलाफ चेतावनी दी। विजयन का कहना था कि नारायण गुरु ने हमेशा एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर का समर्थन किया, जो जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ था। विजयन ने यह भी दावा किया कि श्री नारायण गुरु न तो सनातन धर्म के प्रवक्ता थे और न ही इसके अनुयायी, बल्कि उन्होंने एक ऐसा धर्म प्रस्तुत किया जो समाज के लिए अधिक उपयुक्त था और जो जातिवाद की चूलें हिला देता था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि गुरु ने इस तरह के जातिवादी विचारधारा, जिसे वह ‘वर्णाश्रम धर्म’ के रूप में पहचानते थे, को नकारा था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गुरु का तपस्वी जीवन और कार्य यह साबित करते हैं कि वह जातिवाद और चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के खिलाफ थे, और उन्होंने समाज में समानता की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
विजयन के इस बयान के बाद भाजपा ने उन पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा ने आरोप लगाया है कि विजयन के बयान से उनका हिंदू धर्म के प्रति तिरस्कारपूर्ण दृष्टिकोण स्पष्ट हो गया है और उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए श्री नारायण गुरु की विरासत को धूमिल करने की कोशिश की। भाजपा नेताओं ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री ने केवल श्री नारायण गुरु का अपमान नहीं किया, बल्कि उन्होंने उस समुदाय का भी अपमान किया, जिसे गुरु ने अपनी शिक्षा और कार्यों के माध्यम से सम्मान दिलवाया था।
भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री वी मुरलीधरन ने कहा कि इस बयान से न सिर्फ नारायण गुरु की, बल्कि पूरे श्री नारायणिया समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंची है। वहीं, कांग्रेस के नेता वीडी सतीशन ने भी इस बयान की आलोचना की, और कहा कि विजयन का बयान यह दिखाता है कि वे सनातन धर्म को संघ परिवार से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि सनातन धर्म एक सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत है, जो सबका है, न कि किसी एक राजनीतिक पार्टी का।
इस सियासी विवाद के पीछे का मुख्य कारण केरल के एझावा समुदाय का वोट बैंक है, जो लगभग 23% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से वामपंथी दलों का समर्थक रहा है, लेकिन अब भाजपा सहित अन्य दल इस समुदाय को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अगले विधानसभा चुनाव में उनकी जीत के लिए यह वोट बैंक महत्वपूर्ण हो सकता है।
खासतौर पर, भाजपा ने इस समुदाय के वोटों पर ध्यान केंद्रित किया है और इसे अपने चुनावी अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
2011 और 2016 के विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा ने एझावा समुदाय के वोटों में वृद्धि देखी है। 2006 में भाजपा को इस समुदाय का 6% वोट मिला था, जो 2011 में बढ़कर 7% और 2016 में 17% हो गया। वहीं, वाम दलों को इस समुदाय का समर्थन कम होते हुए 2006 में 64% से घटकर 2016 में 49% रह गया। इस समुदाय का कुछ हिस्सा कांग्रेस को भी समर्थन दे रहा है, लेकिन भाजपा ने इस समूह को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कई कदम उठाए हैं।
अब सवाल यह उठता है कि सियासी दलों द्वारा श्री नारायण गुरु के नाम पर ‘अपनी ढपली अपना राग’ क्यों अलापा जा रहा है?
इसका उत्तर इसी समुदाय के वोट बैंक में छिपा हुआ है, जो अब राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण बन गया है। भाजपा के लिए यह वोट बैंक आकर्षण का कारण बन चुका है, और अब वह इसे अपने पक्ष में करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है।
श्री नारायण गुरु का योगदान केरल की सामाजिक और धार्मिक चेतना में अनमोल था। उनका जन्म 20 अगस्त 1856 को केरल के तिरुवनंतपुरम के पास चेम्पाजंथी गांव में हुआ था। वे एक महान समाज सुधारक थे, जिन्होंने अपनी जीवनभर की यात्रा में जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ संघर्ष किया। वे एझावा समुदाय से थे, जो उस समय को अछूत माना जाता था। उन्होंने अपने जीवन में 'एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर' का नारा दिया, जिससे जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ एक आंदोलन की शुरुआत हुई।
नारायण गुरु ने 1888 में अरुविप्पुरम में भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर की स्थापना की, जो जातिवाद के खिलाफ था।
इसके अलावा, उन्होंने अन्य स्थानों पर भी ऐसे कार्य किए जो सामाजिक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम थे। उनकी आध्यात्मिकता कर्मकांड और मूर्ति पूजा से दूर, आत्म-चिंतन में निहित थी, जिसे उन्होंने अपने जीवन में अमल किया। उनके विचारों ने न सिर्फ केरल में बल्कि पूरे भारत में सामाजिक समानता की एक नई रोशनी जलाई।
हाल ही में, ईसाई धर्मगुरु पोप फ्रांसिस ने भी श्री नारायण गुरु की सराहना की और उनके मानव एकता के संदेश को महत्वपूर्ण बताया। पोप ने कहा कि गुरु ने हमेशा यह सिखाया कि सभी मानव एक ही परिवार का हिस्सा हैं, चाहे उनकी जाति या धर्म कुछ भी हो। उन्होंने समाज में समानता और भाईचारे का संदेश दिया, जो आज भी प्रासंगिक है।
विजयन के बयान और इस पूरे विवाद से यह स्पष्ट है कि श्री नारायण गुरु की विरासत को लेकर केरल में सियासी मंथन तेज हो गया है, और हर पार्टी अपने चुनावी हितों के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रही है।
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