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इमामों के मुखिया का केजरीवाल पर हमला, बोले- 'सिर्फ झूठे वादे और कटोरा ही मिला

 25 May 2026

दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले पुजारियों, ग्रंथियों और इमामों के वेतन को लेकर राजनीति का तूल पकड़ लिया है। एक ओर जहां आम आदमी पार्टी (आप) ने चुनाव जीतने पर पुजारियों और ग्रंथियों को हर महीने 18 हजार रुपये सम्मान राशि देने का वादा किया है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली के वक्फ बोर्ड के करीब 250 इमाम पिछले 17 महीनों से लंबित वेतन के लिए केजरीवाल सरकार से शिकायत कर रहे हैं। इन इमामों का कहना है कि वेतन मिलने में लगातार देरी हो रही है, और इस मुद्दे पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। 


 ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन (एआईआईएमए) के प्रमुख साजिद रशिदी ने 'आप' सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि केजरीवाल सरकार ने शुरुआत में इमामों को फायदा देने का वादा किया था, लेकिन बाद में यह वादा सिर्फ खोखला साबित हुआ। रशिदी ने न्यूज 24 से बातचीत में कहा, "जब से केजरीवाल सरकार सत्ता में आई है, एक बार भी छह महीने तक इमामों को वेतन नहीं मिला है। जब भी वेतन मिला, तो वह 5-6 महीने की देरी के बाद मिला। जबकि सरकार के पास पैसों की कोई कमी नहीं है, फिर भी इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।" रशिदी ने यह भी आरोप लगाया कि केजरीवाल जानबूझकर मुसलमानों और पादरियों के मामले से बच रहे हैं, क्योंकि इससे उनकी राजनीति कमजोर हो सकती है। 

 रशिदी ने यह भी आरोप लगाया कि 2020 में केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के सभी इमामों को वेतन देने का वादा किया था, लेकिन इसके बाद वक्फ बोर्ड के स्थायी इमामों के साथ धोखा हुआ। उन्होंने बताया कि "केजरीवाल जी ने घोषणा की कि प्राइवेट मस्जिदों के इमामों को भी वेतन मिलेगा, लेकिन इसके कारण स्थायी इमामों का नुकसान हुआ। पहले वक्फ बोर्ड से मिलने वाले वेतन में कमी आई और अब स्थायी इमामों के वेतन को ग्रांट पर निर्भर कर दिया गया, जिससे हमारी स्थिति और भी खराब हो गई।" रशिदी का कहना है कि सरकार ने 37 करोड़ रुपये का ग्रांट मंजूर किया था, लेकिन इसके बावजूद स्थायी इमामों को वेतन नहीं दिया गया।

 रशिदी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई इमामों, ग्रंथियों या पुजारियों का सम्मान नहीं, बल्कि एक चुनावी रणनीति है। उन्होंने कहा, "जब लोग जानेंगे कि इमामों को वेतन नहीं मिला, तो इससे उनके सम्मान पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।" उन्होंने यह भी कहा कि गुरुद्वारे के ग्रंथियों को सरकारी मदद की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि वे खुद सक्षम हैं, लेकिन पुजारियों को इस तरह के वादों से भ्रमित किया जा सकता है। उनका आरोप है कि यह सब चुनावी लाभ के लिए किया जा रहा है, और चुनाव के बाद यह वादा पूरा होने की कोई उम्मीद नहीं है, जैसे महिलाओं के रजिस्ट्रेशन के वादे के बाद कुछ भी नहीं हुआ। रशिदी का कहना है कि दिल्ली सरकार ने 2020 में वक्फ बोर्ड के इमामों के वेतन को लेकर जो घोषणा की थी, उसका कोई फायदा स्थायी इमामों को नहीं हुआ। इसके बजाय यह निर्णय उनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ। इसके चलते इमामों की स्थिति और भी कमजोर हो गई है।