उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति से जुड़ी एक लंबे समय से चली आ रही धारणा यह रही है कि चयन प्रक्रिया में पहली पीढ़ी के वकीलों को उचित महत्व नहीं दिया जाता। इसके बजाय, उन वकीलों को प्राथमिकता दी जाती है जिनके परिवार के सदस्य पहले से ही न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा होते हैं। इस तरह की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर अक्सर यह माना जाता है कि दूसरी पीढ़ी के वकीलों को जज बनने का ज्यादा अवसर मिलता है, जिनके परिजन पहले से ही जज रहे हैं या अभी भी न्यायपालिका से जुड़े हुए हैं। अब इस धारणा को खत्म करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम कॉलेजियम द्वारा उठाया जा सकता है।
हाल ही में यह जानकारी सामने आई है कि कॉलेजियम जजों के चयन में एक नया प्रस्ताव लेकर आया है, जिसके तहत अब उन लोगों के नामों को आगे बढ़ाने से परहेज किया जाएगा जिनके परिजन या रिश्तेदार पहले से उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट के जज रहे हैं। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो यह न्यायिक चयन प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव होगा। वर्तमान में, कई जजों के परिवारों में पहले से ही कोई सदस्य न्यायिक पेशे से जुड़ा हुआ होता है, और उनके परिवारों के अन्य सदस्य भी जज बनते रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, कॉलेजियम में कुछ जजों का यह विचार था कि ऐसे व्यक्तियों के नामों पर विचार नहीं किया जाए, जिनके परिवार में पहले से जज रहे हों। हालांकि, इस विचार पर गंभीर मंथन हुआ और यह सवाल भी उठाया गया कि इस निर्णय से कुछ ऐसे योग्य लोग भी चयन प्रक्रिया से बाहर हो सकते हैं जो न्यायपालिका में आने के लिए पूरी तरह से सक्षम हैं। इसके जवाब में यह तर्क दिया गया कि यदि ऐसा होता है तो भी उन व्यक्तियों को वकालत में अपनी सफलता से कोई समस्या नहीं होगी, क्योंकि उनके पास अच्छी खासी आय के अवसर होते हैं। यह कहा गया कि ऐसे लोग अपने जीवन में अच्छा करियर बना सकते हैं और उन्हें धन कमाने में कोई कठिनाई नहीं होगी। हालांकि कुछ व्यक्तियों के लिए यह निर्णय नुकसानदायक हो सकता है, लेकिन व्यापक दृष्टिकोण से यह फैसला न्यायपालिका में पारदर्शिता लाने के लिए आवश्यक है।
यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को खारिज कर दिया था। यह आयोग सरकार द्वारा न्यायिक नियुक्तियों के लिए स्थापित किया गया था, और इसके गठन के लिए संसद से कानून भी पारित करवा लिया गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसके बाद न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया फिर से कॉलेजियम प्रणाली के तहत ही होनी लगी। ऐसे में, अब कॉलेजियम द्वारा इस तरह का बदलाव प्रस्तावित करना एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो न्यायपालिका में चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा देगा।
जब NJAC को खारिज किया गया था, तब एक वकील ने इस मुद्दे पर परिवारवाद का मामला उठाया था। उनका कहना था कि कॉलेजियम प्रणाली में जज खुद अपने सहयोगियों को चुनते हैं, जिससे यह धारणा बनी रहती है कि जज ही जज को चुनते हैं। उनका यह भी कहना था कि इससे चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी आती है और कभी-कभी ऐसे लोग ही चुने जाते हैं जिनके परिवार पहले से ही न्यायपालिका से जुड़े हुए होते हैं। एक वकील ने यह दावा किया था कि लगभग 50 प्रतिशत जज ऐसे होते हैं जिनके परिवार में पहले से ही कोई सदस्य न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा रहा है। इस प्रकार की पारिवारिक कनेक्शन वाली नियुक्तियों की आलोचना करते हुए कॉलेजियम में बदलाव की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
यद्यपि यह अभी तक केवल एक प्रस्ताव है, लेकिन इस पर लागू होने में समय लग सकता है। इस बदलाव से निश्चित रूप से न्यायपालिका के भीतर पारदर्शिता और निष्पक्षता में सुधार होगा। इससे एक नई उम्मीद भी जगी है कि न्यायिक नियुक्तियों में अब और अधिक योग्य उम्मीदवारों को अवसर मिलेंगे। इसके अतिरिक्त, कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना अक्सर सरकार और नागरिक समाज दोनों की ओर से की जाती रही है, जो इसे पारदर्शी और जवाबदेह नहीं मानते हैं। इसी संदर्भ में हाल ही में कॉलेजियम ने एक और सुधारात्मक कदम उठाया है, जिसके तहत अब चयन प्रक्रिया से पहले कॉलेजियम में शामिल जज संबंधित व्यक्तियों से मुलाकात करते हैं और इंटरव्यू भी लेते हैं। इस कदम से यह उम्मीद जताई जा रही है कि नियुक्तियों में अधिक सावधानी बरती जाएगी और यह प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी।