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सुप्रीम कोर्ट ने पेट्रोल एथेनॉल जानकारी की याचिका खारिज की

 31 Aug 2026

पेट्रोल एथेनॉल जानकारी: सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

पेट्रोल एथेनॉल जानकारी: सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है जिसमें यह अनुरोध किया गया था कि पेट्रोल के डिस्पेंसिंग नोजल पर ग्राहकों को मिलाए गए एथेनॉल की मात्रा का उल्लेख किया जाए। याचिका में यह भी कहा गया था कि पेट्रोल भरने के बाद प्राप्त होने वाले बिल पर भी एथेनॉल के प्रतिशत की जानकारी होनी चाहिए। इस याचिका को ऐडवोकेट एनके गोस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता यदि चाहें, तो इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जा सकते हैं।


याचिकाकर्ता की दलीलें

पेट्रोल एथेनॉल जानकारी: याचिकाकर्ता ने अदालत में कहा कि उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार है कि वे जो ईंधन खरीद रहे हैं, उसमें क्या सामग्री और कितनी मात्रा में मिलाई गई है। उनका कहना था कि रसीद में यह जानकारी उपलब्ध नहीं होती है, जिससे ग्राहकों को यह नहीं पता चलता कि वे क्या खरीद रहे हैं। याचिकाकर्ता की इस मांग पर अटॉर्नी जनरल ने आपत्ति जताई थी।


अटॉर्नी जनरल की आपत्ति

गोस्वामी ने अपनी याचिका के माध्यम से कहा कि यह उनके व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए है। उन्होंने चेतावनी दी कि हर नागरिक को यह जानने का हक है कि वह किस चीज के लिए पैसे दे रहा है। अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया कि इस प्रकार की याचिकाएं पहले भी आ चुकी हैं और उन्हें खारिज किया गया है।


कोर्ट की प्रतिक्रिया

पेट्रोल एथेनॉल जानकारी: सुप्रीम कोर्ट ने जब वकील से पूछा कि यह याचिका ई-20 से संबंधित है, तो अदालत ने वकील से पूछा कि वह कौन हैं और कहां प्रैक्टिस करते हैं। इसके बाद कोर्ट ने यह कहा कि याचिकाकर्ता इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जा सकते हैं। गोस्वामी ने जवाब दिया कि उन्हें यह जानने का अधिकार है कि जब वे पेट्रोल खरीदते हैं तो उस पर यह नहीं लिखा होता कि यह ई-20 है। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी पॉलिसी को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि केवल यह चाहते हैं कि ग्राहकों को जानकारी उपलब्ध हो।


समिति बनाने की मांग

याचिका में यह भी प्रस्तावित किया गया था कि सड़क एवं परिवहन राजमार्ग मंत्रालय, पेट्रोलियम मंत्रालय, भारतीय मानक ब्यूरो, ऑटोमोबाइल इंजीनियरों, उपभोक्ता संगठनों, पर्यावरण विशेषज्ञों और जल संसाधन ज्ञानियों को शामिल करके एक समिति बनाई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को भी खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता इसे उच्च न्यायालय में रख सकते हैं।


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