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मॉनसून सत्र में हंगामा: हर मिनट 2.5 लाख रुपये का बड़ा नुकसान

 13 Aug 2026

मॉनसून सत्र में हंगामा: अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ सत्र

मॉनसून सत्र में हंगामा: संसद का मॉनसून सत्र, जो 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला, विभिन्न हंगामों, नारेबाजी और राजनीतिक गतिरोध के बीच अंततः अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इस 19 दिन के सत्र में कुछ कानून पास हुए, लेकिन बहस और जनता से जुड़ी मुद्दों पर चर्चा के आंकड़े बेहद निराशाजनक रहे।


हंगामों के चलते न केवल करदाताओं का करोड़ों रुपये व्यर्थ गया, बल्कि लोकतंत्र का महत्वपूर्ण पक्ष प्रश्नकाल भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ।


संसद का हर मिनट है महंगा

मॉनसून सत्र में हंगामा: संसद में व्यवधान के आर्थिक प्रभाव का एक उदाहरण 2012 का आंकड़ा है, जब तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने बताया था कि संसद चलाने में हर मिनट लगभग 2.5 लाख रुपये का खर्च आता है। इस आंकड़े में लोकसभा और राज्यसभा दोनों का खर्च शामिल है। यदि महंगाई के प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाए, तो यह खर्च आज और भी अधिक हो गया है।


पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, सत्र के पहले तीन दिनों में लोकसभा के 1,026 मिनट और राज्यसभा के 816 मिनट बर्बाद हुए। इससे लगभग 23 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, यदि 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट के पुरानी दर से गणना की जाए।


प्रश्नकाल का महत्व और स्थिति

मॉनसून सत्र में हंगामा: संसदीय लोकतंत्र में प्रश्नकाल वह समय होता है जब सांसद मंत्री से सीधे सवाल पूछ सकते हैं। पीआरएस के अनुसार, विधायी कार्यों का समय बढ़ाने से नुकसान की भरपाई की जा सकती है, लेकिन प्रश्नकाल का समय बीतने के बाद उसकी भरपाई संभव नहीं है।


16वीं लोकसभा में प्रश्नकाल का केवल 67% हिस्सा ही काम कर पाया, जबकि हाल के आंकड़ों के अनुसार यह औसतन 59% रहा। 2023 के मॉनसून सत्र में राज्यसभा में 8 दिन ऐसे रहे जब प्रश्नकाल एक मिनट भी नहीं चला।


विधेयकों की पारित होने की स्थिति

हंगामों के कारण जब समय कम बचता है, तो विधेयक या तो लंबित रह जाते हैं या बिना किसी गहन चर्चा के पारित हो जाते हैं। 2023 के सत्र में लोकसभा ने 20 विधेयकों को 1 घंटे से भी कम समय में पारित कर दिया, जिसमें से 9 विधेयक तो 20 मिनट के भीतर पास हुए।


संसदीय समितियां कानूनों की समीक्षा करती हैं, लेकिन सार्वजनिक बहस का विकल्प समितियां नहीं हो सकतीं।


राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का खेल

संसद में हंगामे के पीछे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का पुराना पैटर्न देखा जा रहा है। सत्तापक्ष का आरोप है कि विपक्ष केवल हंगामा करके करदाताओं के पैसे की बर्बादी कर रहा है। वहीं, विपक्षी दलों का कहना है कि जब सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की अनुमति नहीं देती, तो विरोध प्रदर्शन ही एकमात्र विकल्प है।


करदाता केवल इसलिए भुगतान नहीं करते कि संसद से कानून पास होते रहें, बल्कि उनके चुने हुए प्रतिनिधियों से सरकार से जवाब मांगने, नीतियों की खामियों को उजागर करने और सार्वजनिक धन का हिसाब लेने की अपेक्षा होती है।


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