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बोफोर्स मामले का अंत, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की अंतिम याचिका

 07 Aug 2026

बोफोर्स मामले का अंत: सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक फैसला

बोफोर्स मामले का अंत: सुप्रीम कोर्ट ने देश के सबसे चर्चित बोफोर्स घोटाले का अध्याय समाप्त कर दिया है। गुरुवार को, न्यायालय ने 2005 के दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले के खिलाफ दायर एकमात्र याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदूजा बंधुओं और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स को सभी आपराधिक मामलों से बरी कर दिया गया था। इस निर्णय के साथ, लगभग 40 वर्षों से चल रहे इस मामले का अंतिम और कानूनी अंत हो गया।


इस मामले की सुनवाई जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने की। बीजेपी नेता और वकील अजय के. अग्रवाल ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए यह याचिका दायर की थी। अग्रवाल ने वर्चुअली सुनवाई के दौरान दो दिवंगत प्रतिवादियों, श्रीचंद पी. हिंदूजा और गोपीचंद पी. हिंदूजा का नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा।


सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ

बोफोर्स मामले का अंत: सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सख्त लहजे में पूछा, "हिंदूजा बंधुओं और सीबीआई से संबंधित यह क्या स्थिति है?" जब उन्हें बताया गया कि हाई कोर्ट ने आरोपियों को बरी करते हुए मामले को रद्द कर दिया था, तो पीठ ने टिप्पणी की, "सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी है। अब यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?" अदालत ने मामले को स्थगित करने से साफ इनकार करते हुए कहा कि यह 2018 का मामला है और इसे आगे बढ़ाने का कोई सवाल नहीं है। इस प्रकार, अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया।


बोफोर्स मामले का ऐतिहासिक संदर्भ

बोफोर्स मामले का अंत: इस याचिका के खारिज होने के साथ ही बोफोर्स मामले में 2005 के बरी होने वाले फैसले के खिलाफ बची हुई अंतिम न्यायिक चुनौती भी समाप्त हो गई है। इससे पहले, नवंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की एक अपील को भी खारिज कर दिया था। सीबीआई ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ 4,522 दिनों की देरी से अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जिसका कोई ठोस कारण वह नहीं दे पाई थी।


2005 में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस आर.एस. सोढ़ी ने हिंदूजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ सभी आरोपों को रद्द करते हुए सीबीआई की जांच की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि इस मामले की जांच में सरकार के खजाने के लगभग 250 करोड़ रुपये बर्बाद हो गए।


बोफोर्स घोटाले का राजनीतिक प्रभाव

बोफोर्स घोटाला, जो 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 1,437 करोड़ रुपये के करार के साथ शुरू हुआ था, भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपों की सप्लाई के लिए था। अप्रैल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने खुलासा किया कि इस सौदे के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिया गया था।


इस घोटाले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की छवि को गंभीर नुकसान पहुँचाया और 1989 के लोकसभा चुनाव में यह सबसे बड़ा मुद्दा बन गया, जिससे कांग्रेस को सत्ता खोनी पड़ी।


जांच और कानूनी कार्रवाई का इतिहास

जनवरी 1990 में सीबीआई ने पूर्व बोफोर्स अध्यक्ष मार्टिन अर्दबो, कथित बिचौलिए विन चड्ढा और हिंदूजा बंधुओं के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के तहत एफआईआर दर्ज की। इसके बाद, कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई, जिसमें अक्टूबर 2000 में हिंदूजा बंधुओं का नाम भी जोड़ा गया।


बोफोर्स मामले का अंत: हालांकि, समय के साथ यह मामला अदालतों में कमजोर पड़ गया। 2005 के हाई कोर्ट के फैसले से पहले, फरवरी 2004 में जस्टिस जे.डी. कपूर ने पूर्व पीएम राजीव गांधी को आपराधिक जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया था। इसी तरह, क्वात्रोची को भारत लाने की सारी कोशिशें नाकाम रहने के बाद 2011 में एक ट्रायल कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। 2013 में उसकी मृत्यु हो गई, जबकि इस मुकदमे के दौरान विन चड्ढा, मार्टिन अर्दबो और पूर्व रक्षा सचिव एस.के. भटनागर का भी निधन हो चुका है।


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