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Mamata Banerjee के सामने संकट, TMC में टूट से बढ़ी राजनीतिक चुनौती

 09 Jul 2026

Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक मजबूत पकड़ रखने वाली Mamata Banerjee इन दिनों अपने राजनीतिक करियर के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी हार के बाद उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) में अंदरूनी संकट गहराता जा रहा है। पार्टी में टूट, आर्थिक परेशानियों और राजनीतिक अलगाव ने ममता के सामने कई नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। 


एक समय बंगाल की राजनीति में सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिनी जाने वाली Mamata Banerjee ने अपने दम पर 34 साल लंबे वाम मोर्चे के शासन को खत्म किया था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। आरोप है कि केंद्र और कांग्रेस जैसे दलों से उनके रिश्ते खराब हो गए हैं, जबकि पुराने राजनीतिक विरोधियों से भी उनकी दूरी बनी रही। इसका असर अब उनकी राजनीतिक स्थिति पर दिखाई दे रहा है।

Mamata Banerjee: ममता ने खुद सीमित किए राजनीतिक विकल्प 

West Bengal Politicsराजनीतिक जानकारों का मानना है कि Mamata Banerjee ने अपने लंबे राजनीतिक सफर में कई बार राष्ट्रीय दलों के साथ गठबंधन किए, लेकिन समय के साथ दोनों बड़े दलों का भरोसा भी खो दिया। उन्होंने कभी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले NDA तो कभी कांग्रेस के नेतृत्व वाले UPA के साथ राजनीतिक समीकरण बनाए, जिसका उन्हें कई मौकों पर फायदा भी मिला।

हालांकि, लगातार टकराव की राजनीति और अपनी शर्तों पर चलने की रणनीति के कारण आज उनके लिए नए राजनीतिक रास्ते तलाशना मुश्किल होता जा रहा है। सहयोगियों से दूरी और विपक्षी दलों के साथ मतभेदों ने उनकी स्थिति को कमजोर किया है।

TMC संगठन में बढ़ी टूट की चुनौती

Bengal Political Crisis2026 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष बढ़ने की खबरें सामने आईं। पार्टी के कई विधायक और सांसद अब Mamata Banerjee के साथ नहीं बताए जा रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, करीब 60 विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं, जबकि ममता के पास सीमित संख्या में विधायक बचे हैं। संसद में भी पार्टी की ताकत कम होने की बात कही जा रही है। TMC के कई सांसदों के रुख बदलने से पार्टी नेतृत्व के सामने संगठन को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।

कभी संघर्ष की पहचान थीं ममता 

Mamata Banerjee का राजनीतिक सफर संघर्षों से भरा रहा है। कांग्रेस से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाली ममता ने 1984 के लोकसभा चुनाव में जादवपुर सीट से जीत हासिल कर राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाई थी। उन्होंने दिग्गज वाम नेता Somnath Chatterjee को हराकर अपनी पहचान बनाई।

1997 में कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। इसके बाद उन्होंने बंगाल की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आक्रामक शैली और सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष करने की छवि ने उन्हें लोकप्रिय बनाया।

2011 की जीत ने बदली थी बंगाल की राजनीति 

Mamata Banerjee की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि 2011 में सामने आई, जब उन्होंने वाम मोर्चे की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। भारी बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने करीब 34 वर्षों से चले आ रहे वाम शासन का अंत किया। 

लेकिन सत्ता में आने के बाद उन पर आरोप लगे कि उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं पर नियंत्रण कमजोर रहा। विरोधियों ने TMC कार्यकर्ताओं पर अराजकता और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। समय के साथ यही मुद्दे उनकी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में अहम साबित हुए।

भ्रष्टाचार और संगठनात्मक कमजोरी बनी परेशानी

ममता सरकार पर भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा से जुड़े कई आरोप लगे। विपक्ष ने इन मुद्दों को लगातार उठाया और चुनावों में इसका असर देखने को मिला। 2026 के विधानसभा चुनाव में TMC को बड़ा झटका लगा और BJP ने बहुमत हासिल कर सरकार बना ली। चुनावी हार के बाद पार्टी में असंतोष और तेज हो गया। नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे और कई पुराने समर्थकों ने दूरी बनानी शुरू कर दी।

आर्थिक संकट और पार्टी के अस्तित्व पर सवाल 

Mamata Banerjee की मुश्किलें केवल राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा TMC के बैंक खातों को फ्रीज किए जाने की बात सामने आई है, जिससे करीब 440 करोड़ रुपये की राशि प्रभावित होने का दावा किया जा रहा है। इसके अलावा चुनाव आयोग के स्तर पर भी पार्टी की मान्यता और चुनाव चिन्ह को लेकर चुनौती बनी हुई है। हालांकि ममता गुट ने अपना पक्ष रखते हुए जवाब दाखिल किया है।

भविष्य की राह आसान नहीं 

हाल के घटनाक्रमों ने Mamata Banerjee के राजनीतिक भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी में टूट, आर्थिक दबाव और सहयोगियों की कमी के बीच उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को दोबारा मजबूत करना है। 

जो नेता कभी बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थीं, उन्हें अब अपनी पार्टी और राजनीतिक आधार को बचाने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। आने वाला समय तय करेगा कि ममता बनर्जी एक बार फिर वापसी कर पाती हैं या फिर बंगाल की राजनीति में उनका प्रभाव सीमित होकर रह जाता है।

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