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Maneka Gandhi Wildlife: मेनका ने मोर संरक्षण के लिए बदलाव की मांग की

 03 Jul 2026

Maneka Gandhi Wildlife: भारतीय जनता पार्टी (BJP) की वरिष्ठ नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और लंबे समय से पशु अधिकारों के लिए आवाज उठाती रही Maneka Gandhi ने राष्ट्रीय पक्षी मोर की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि वन्यजीव संरक्षण कानून में दी गई एक विशेष छूट का दायरा समय के साथ इतना बढ़ गया कि इसके आसपास एक पूरा व्यावसायिक तंत्र विकसित हो गया। Maneka Gandhi का मानना है कि इस व्यवस्था की दोबारा समीक्षा किए जाने की जरूरत है ताकि मोरों के अवैध शिकार और उनके पंखों के व्यापार पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।


नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, पशु कल्याण और सामाजिक जिम्मेदारी को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ विषय बताते हुए कहा कि किसी भी कानून में दी गई छूट का गलत इस्तेमाल भविष्य में गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।

Maneka Gandhi Wildlife: 1972 के कानून की छूट पर उठाए सवाल

Wildlife Protection LawsManeka Gandhi ने अपनी बात रखते हुए 1972 के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस कानून में दिगंबर जैन समुदाय के साधुओं को धार्मिक उपयोग के लिए झड़े हुए मोर के पंखों से बनी ‘पिच्छी’ रखने और इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई थी। यह छूट धार्मिक परंपरा को ध्यान में रखते हुए दी गई थी।

हालांकि, उनके अनुसार समय के साथ इस सीमित अनुमति का दायरा बढ़ता गया और इसके आधार पर मोर के पंखों का बड़ा बाजार तैयार हो गया। उन्होंने कहा कि एक बार जब किसी चीज के लिए कानूनी रास्ता खुल जाता है तो उसके आसपास व्यावसायिक गतिविधियां भी तेजी से बढ़ने लगती हैं।

एक छूट से पूरा उद्योग तैयार हो गया 

Illegal Peacock HuntingManeka Gandhi ने कहा कि शुरुआत में दी गई यह रियायत सीमित उद्देश्य के लिए थी, लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर व्यापार के रूप में होने लगा। उन्होंने कहा, वह छूट दी गई थी, लेकिन एक बार जब दरवाजा खुला, तो इसके आसपास एक पूरा उद्योग ही खड़ा हो गया।

उन्होंने इस दावे को भी खारिज किया कि बाजार में बिकने वाले अधिकांश मोर पंख प्राकृतिक रूप से झड़ने के बाद ही इकट्ठा किए जाते हैं। उनका कहना था कि जब किसी वस्तु की व्यावसायिक मांग लगातार बढ़ती है तो केवल प्राकृतिक रूप से प्राप्त होने वाली सामग्री उस मांग को पूरा नहीं कर सकती। ऐसी स्थिति में अवैध गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की आशंका भी बढ़ जाती है।

कानून बदलने की कोशिश का किया जिक्र 

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने बताया कि जब Atal Bihari Vajpayee प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने इस कानूनी खामी को दूर करने के लिए संशोधन का प्रयास भी किया था। उनका उद्देश्य था कि कानून में मौजूद उस व्यवस्था को बदला जाए, जिसका गलत इस्तेमाल होने की संभावना बनी रहती है।

हालांकि, उन्होंने बताया कि उस समय यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका और कानून में कोई बदलाव नहीं हो पाया। Maneka Gandhi ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय की परंपरा पर सवाल उठाना नहीं है, बल्कि उन कानूनी प्रावधानों की समीक्षा करना है जिनका दुरुपयोग किया जा सकता है।

विरोध के बावजूद अपने रुख पर कायम 

Maneka Gandhi ने कहा कि इस मुद्दे को उठाने के बाद उन्हें जैन संगठनों की ओर से विरोध और कानूनी नोटिसों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने विचारों में कोई बदलाव नहीं किया। उनका कहना है कि पशु कल्याण का विषय किसी एक समुदाय या परंपरा से ऊपर है और इसे व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर किसी कानून की वजह से किसी जीव को नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा होती है, तो उस कानून की समीक्षा करना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।

केरल की घटना का भी किया उल्लेख

अपने संबोधन के दौरान Maneka Gandhi ने कोविड-19 महामारी के समय केरल के मलप्पुरम जिले की उस घटना का भी जिक्र किया, जिसमें फलों के अंदर विस्फोटक भरकर रखे जाने से हाथियों के घायल होने की घटनाएं सामने आई थीं।

उन्होंने कहा कि जब हाथी ऐसे फल खा लेते थे तो विस्फोट के कारण उनके जबड़े बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाते थे। इस संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी प्रथा या परंपरा के नाम पर जानवरों को पीड़ा पहुंचती है, तो क्या उसे सही माना जा सकता है। उनके अनुसार किसी भी परंपरा का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे किसी जीव को अनावश्यक कष्ट तो नहीं पहुंच रहा।

समाज में बदलाव की जरूरत पर दिया जोर

पशु अधिकारों की पैरवी करते हुए Maneka Gandhi ने कहा कि समाज समय के साथ बदलता है और कई ऐसी व्यवस्थाएं हैं जिनमें बदलाव पहले भी हुए हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक समय महिलाओं को मतदान का अधिकार नहीं था, लेकिन बाद में समाज और कानून दोनों बदले और उन्हें समान अधिकार मिले।

इसी तरह उन्होंने कहा कि पशुओं के अधिकारों और उनके संरक्षण को लेकर भी समाज को नई सोच अपनानी होगी। उनके अनुसार केवल परंपरा के आधार पर किसी व्यवस्था को हमेशा जारी रखना उचित नहीं कहा जा सकता।

लोगों से की सोच बदलने की अपील

अपने संबोधन के अंत में Maneka Gandhi ने लोगों से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि उनके विचारों से असहमति हो सकती है, लेकिन इस विषय पर शांत होकर विचार जरूर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि लोग कुछ समय निकालकर यह सोचें कि किसी कानूनी छूट का असर वन्यजीवों पर क्या पड़ रहा है, तो शायद समाधान का रास्ता निकल सकता है।

उन्होंने दोहराया कि मोर देश का राष्ट्रीय पक्षी है और उसे सुरक्षित वातावरण में जीने का अधिकार मिलना चाहिए। उनका कहना था कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इस सुंदर पक्षी के सामने अनावश्यक खतरे बढ़ सकते हैं। इसलिए कानून में मौजूद संभावित खामियों की समीक्षा कर ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिससे धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी बना रहे और वन्यजीव संरक्षण का उद्देश्य भी पूरी तरह पूरा हो सके।

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