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NDA Numbers Strong: संसद में बढ़त के लिए लगातार मजबूत हो रहा गठबंधन

 25 Jun 2026

NDA Numbers Strong: संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने अपनी राजनीतिक रणनीति को नई दिशा देनी शुरू कर दी है। पार्टी अब केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि संसद के भीतर अपना संख्याबल लगातार बढ़ाकर दीर्घकालिक राजनीतिक बढ़त सुनिश्चित करने की कोशिश में जुटी है। इसी रणनीति के तहत पूर्वोत्तर भारत एक बार फिर BJP के राजनीतिक फोकस में आ गया है। 


राजनीतिक जानकारों का मानना है कि BJP अब उन दलों और सांसदों को साधने की कोशिश कर रही है, जो औपचारिक रूप से NDA का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन केंद्र सरकार के प्रति नरम रुख रखते हैं या मुद्दों के आधार पर समर्थन देने को तैयार हैं।

NDA Numbers Strong: पूर्वोत्तर में 25 सीटों का गणित और BJP की नजर 

Northeast Key Focusपूर्वोत्तर भारत की कुल 25 लोकसभा सीटों में से फिलहाल 16 सीटें NDA के खाते में हैं। इनमें BJP के पास 13 सांसद हैं, जबकि असम गण परिषद (AGP), यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) और सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा (SKM) के पास एक-एक सांसद है। दूसरी ओर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के पास कुल 9 सीटें हैं। कांग्रेस के पास 7 सांसद हैं, जबकि वॉइस ऑफ द पीपुल पार्टी (VPP) और जोरम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) के पास एक-एक सांसद है।

BJP की रणनीति का ताजा संकेत मिजोरम की सत्तारूढ़ पार्टी ZPM से मिला है। पार्टी के नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद लालतलुआंगकिमा ने संसद में NDA सरकार को मुद्दा-आधारित समर्थन देने की घोषणा की है। ZPM का लोकसभा में भी एक सांसद है। ऐसे में भले ही पार्टी औपचारिक रूप से NDA में शामिल न हो, लेकिन उसका समर्थन सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पांच मोर्चों पर चल रही है BJP की रणनीति

Political Support Buildingसंसद में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए BJP बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रही है। सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पार्टी पांच अलग-अलग मॉडलों के जरिए संख्याबल मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पहला मॉडल प्रत्यक्ष दलबदल का है, जिसके तहत विपक्षी सांसदों को सीधे BJP में शामिल करने की कोशिश की जाती है।

दूसरा मॉडल राज्यसभा में इस्तीफों की रणनीति माना जा रहा है। इसके तहत विपक्षी सांसदों के इस्तीफों के जरिए राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। तीसरा तरीका सहयोगी दलों को मजबूत करने का है। इसमें विपक्षी नेताओं को सीधे BJP में लाने के बजाय NDA के किसी सहयोगी दल में शामिल कराया जाता है।

चौथा मॉडल क्षेत्रीय समीकरणों पर आधारित है। इसके तहत छोटे और तटस्थ दलों को NDA के करीब लाकर नए राजनीतिक गठजोड़ बनाए जाते हैं। पांचवां मॉडल विपक्षी दलों में बगावत और विभाजन से जुड़ा है। इसमें टूटकर बने गुटों को राजनीतिक और वैधानिक पहचान दिलाकर उन्हें NDA के पक्ष में खड़ा करने की कोशिश की जाती है।

NDA के भीतर भी बदल रहा शक्ति संतुलन

BJP की यह रणनीति केवल विपक्ष को कमजोर करने तक सीमित नहीं है। इसका असर NDA के अंदर भी दिखाई देने लगा है। लोकसभा चुनाव परिणाम आने के समय BJP के पास 240 सांसद थे। उस समय 16 सांसदों वाली तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) NDA की दूसरी सबसे बड़ी ताकत थी, जबकि 12 सांसदों वाली जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) तीसरे स्थान पर थी।

लेकिन समय के साथ गठबंधन के भीतर राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसदों के एक समूह ने NDA का समर्थन किया, जिससे NDA Numbers Strong हुए और त्रिपुरा आधारित नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी। इससे टीडीपी तीसरे स्थान पर पहुंच गई।

महाराष्ट्र में भी बदले राजनीतिक समीकरण 

महाराष्ट्र में भी NDA को फायदा पहुंचाने वाले घटनाक्रम देखने को मिले। Uddhav Thackeray की शिवसेना से छह सांसद अलग होकर Eknath Shinde के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए। इस बदलाव के बाद शिंदे गुट के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई। इसके चलते शिवसेना (शिंदे गुट) ने JDU को पीछे छोड़ दिया और गठबंधन के भीतर अपनी स्थिति मजबूत कर ली। कभी NDA की तीसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी मानी जाने वाली JDU अब पांचवें स्थान पर पहुंच गई है।

क्या NCP (शरद पवार) में भी हो सकती है हलचल 

राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चाएं भी चल रही हैं कि आने वाले समय में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के कुछ सांसद भी NDA को बाहर से समर्थन दे सकते हैं। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और BJP भी सार्वजनिक रूप से इस विषय पर कुछ कहने से बच रही है। फिर भी राजनीतिक संकेत बताते हैं कि संसद के आगामी सत्रों में विपक्षी खेमे के कुछ और दल या नेता अपना रुख बदल सकते हैं।

दो-तिहाई बहुमत की दिशा में बढ़ता NDA

BJP का लक्ष्य केवल केंद्र की सत्ता बनाए रखना नहीं है। पार्टी अब संसद के दोनों सदनों में अपनी स्थिति को इतना मजबूत करना चाहती है कि NDA Numbers Strong रहें और महत्वपूर्ण विधायी व संवैधानिक फैसलों के समय उसे किसी बड़े राजनीतिक संकट का सामना न करना पड़े।

नए सहयोगी दलों का साथ, विपक्ष से आने वाले नेता, क्षेत्रीय दलों का मुद्दा-आधारित समर्थन और टूटकर बने नए राजनीतिक गुट, इन सभी के सहारे NDA लगातार अपना दायरा बढ़ा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BJP की दीर्घकालिक रणनीति संसद में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचने की है, ताकि गठबंधन भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार रह सके।

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