
स्वदेशी अपनाओ, आत्मनिर्भर भारत बनाओ: मोहन भागवत का राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय चेतना पर संदेश
नई दिल्ली, विज्ञान भवन – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के दूसरे दिन राष्ट्रवाद, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय चेतना पर अपने विचार रखते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वदेशी को अपनाना ही एकमात्र मार्ग है। विज्ञान भवन में आयोजित इस विशेष सत्र में उन्होंने ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ विषय पर विस्तार से चर्चा की।
स्वदेशी ही आत्मनिर्भरता की नींव है
भागवत ने कहा कि देश की आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी जरूरी है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार आवश्यक है, लेकिन वह दबाव में नहीं, स्वेच्छा से होना चाहिए। यही स्वदेशी की मूल भावना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि "पेप्सी और कोका-कोला जैसी विदेशी पेयों की जगह स्वदेशी पेय और खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देनी चाहिए।" उन्होंने जोर देकर कहा कि आत्मनिर्भरता केवल उत्पादन या आयात-निर्यात का मामला नहीं है, बल्कि यह ‘स्व’ के बोध से जुड़ा है – हमारी भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भवन और भ्रमण तक में हमें राष्ट्र को प्राथमिकता देनी होगी।
सच्ची देशभक्ति: समाज की चिंता और संविधान का सम्मान
मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि देशभक्ति केवल भावनाओं से नहीं, कर्म और कर्तव्यों से जुड़ी होती है। उन्होंने कहा: “देशभक्ति का मतलब है समाज का हर समय ध्यान रखना और संविधान का पालन करना।” उन्होंने ‘लॉ इन हैंड’ यानी कानून को हाथ में लेने की प्रवृत्तियों की आलोचना करते हुए कहा कि विरोध यदि आवश्यक हो तो सीमा में रहकर और संविधान के दायरे में किया जाना चाहिए।
भविष्य के युद्ध: केवल हथियारों से नहीं, तकनीक से भी लड़े जाएंगे
भागवत ने एक अहम वैश्विक चेतावनी दी कि आने वाले युद्ध केवल सैनिकों और हथियारों से नहीं लड़े जाएंगे। बल्कि वे तकनीक, खुफिया जानकारी, अर्थव्यवस्था और कूटनीति के मिश्रण होंगे। उन्होंने कहा कि भारत में जितना नकारात्मक दिखाया जाता है, वास्तविकता में उससे कई गुना अधिक सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं।
पर्यावरण और प्लास्टिक: राष्ट्रसेवा की नई दिशा
उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को भी राष्ट्रसेवा का हिस्सा बताया। “प्लास्टिक छोड़ना होगा, पानी और हरियाली पर ध्यान देना होगा, और यह बदलाव मेरे घर से शुरू होना चाहिए,” उन्होंने कहा।
संघ की विचारधारा:
एक ऐसा मॉडल जो दुनिया को प्रेरित करे भागवत ने यह भी कहा कि संघ एक ऐसा सामाजिक मॉडल खड़ा करना चाहता है, जिसे विश्व अनुसरण करे। उन्होंने संघ की शाखाओं और प्रशिक्षण पद्धति को वैश्विक स्तर पर अपनाने योग्य बताया।
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