नेपाल का राजशाही से लोकतंत्र की ओर संघर्ष: शाही नरसंहार से रचे इतिहास में अब लोकतंत्र पर आपत्ति

हिमालय की गोदी में स्थित नेपाल, जो अपनी ऐतिहासिक राजशाही और शाही परंपराओं के लिए जाना जाता था, अब एक लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के मार्ग पर अग्रसर है। यह परिवर्तन आसान नहीं रहा है, क्योंकि नेपाल को अपने राजनीतिक इतिहास में कई उथल-पुथल, संघर्ष और सामाजिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ा है। नेपाल का इतिहास एक ऐसे देश की कहानी है, जो अपनी पहचान को फिर से तलाशने की कोशिश कर रहा है। राजशाही का पतन, शाही परिवार का नरसंहार और लोकतंत्र की दिशा में कई कठिनाइयों का सामना, सभी ने इसे एक सनसनीखेज और जटिल राजनीतिक यात्रा बना दिया है। नेपाल आज भी उस मोड़ पर खड़ा है, जब यहां फिर से राजशाही की वापसी की मांग उठ रही है। ऐसे में यह महत्वपूर्ण है कि हम यह समझें कि नेपाल में राजशाही का अंत कैसे हुआ, शाही परिवार का नरसंहार क्यों हुआ और इसमें भारत की भूमिका क्या रही।


  नेपाल की राजशाही का उदय 1768 में हुआ, जब गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने छोटे-छोटे रजवाड़ों को एकजुट कर एक मजबूत नेपाल की नींव रखी। 1769 में काठमांडू, पाटन और भदगांव के तीन मल्ल राज्यों पर विजय प्राप्त करके नेपाल को एकीकृत किया। शाह वंश का यह दावा था कि वे प्राचीन भारतीय राजपूतों के वंशज हैं। इस वंश ने अगले ढाई सौ वर्षों तक नेपाल पर शासन किया, और इस दौरान नेपाल ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से अपने आप को बचाए रखा। हालांकि, 1814-16 के एंग्लो-नेपाल युद्ध के परिणामस्वरूप नेपाल को अपनी कुछ भूमि, जो आज भारत के उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में हैं, गंवानी पड़ी। 19वीं सदी में राणा वंश ने अपना उदय किया और शाह वंश को केवल एक नाममात्र शासक बना दिया। राणाओं ने ब्रिटिश साम्राज्य के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाए रखे थे, लेकिन 1951 में राजा त्रिभुवन ने राणा शासन के खिलाफ जनआंदोलन किया, जिसके बाद शाह वंश की सत्ता बहाल हो गई। इस समय नेपाल में लोकतंत्र की नींव रखी जा रही थी, लेकिन राजशाही का प्रभाव अभी भी कायम था। 1959 में नेपाल में पहली बार संसदीय चुनाव हुए, लेकिन 1960 में राजा महेंद्र ने लोकतांत्रिक सरकार को भंग कर दिया और पंचायती शासन व्यवस्था लागू की। 1990 में एक जनआंदोलन के जरिए बहुदलीय लोकतंत्र स्थापित किया गया, लेकिन राजशाही कायम रही।

शाही परिवार का नरसंहार


1 जून 2001 नेपाल के इतिहास में 1 जून 2001 का दिन एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उस दिन काठमांडू के नारायणहिती पैलेस में शाही भोज चल रहा था, तभी क्राउन प्रिंस दीपेंद्र शाह ने सैनिक वर्दी पहनकर और बंदूकें लेकर अपने ही परिवार पर गोलियां चला दीं। इस नरसंहार में राजा बीरेंद्र, रानी ऐश्वर्या, उनके बेटे निरंजन, बेटी श्रुति और अन्य सात परिवार सदस्य मारे गए। दीपेंद्र ने बाद में खुद को भी गोली मार ली और तीन दिन बाद उसकी मौत हो गई। आधिकारिक जांच के अनुसार यह पारिवारिक विवाद का परिणाम था। दीपेंद्र को ग्वालियर के शाही परिवार की देवयानी राणा से प्रेम था, लेकिन रानी ऐश्वर्या ने इस रिश्ते को नकार दिया, क्योंकि दोनों परिवारों के बीच पुरानी दुश्मनी थी। दीपेंद्र की शादी सुप्रिया शाह से कराने की योजना बन रही थी, जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर सके। नशे की हालत में दीपेंद्र ने अपनी पूरी फैमिली का खात्मा कर दिया। हालांकि, कुछ लोग इसे साजिश मानते हैं और भारत की खुफिया एजेंसी रॉ का नाम भी इसमें जोड़ा जाता है, लेकिन इसके ठोस प्रमाण कभी नहीं मिले।

लोकतंत्र की ओर कदम इस भयावह नरसंहार के बाद नेपाल में अस्थिरता फैल गई। राजा बीरेंद्र की मौत के बाद उनके भाई ज्ञानेंद्र शाह को ताज सौंपा गया, लेकिन उनकी लोकप्रियता राजा बीरेंद्र जैसी नहीं थी। इस समय नेपाल माओवादी विद्रोह के दौर से गुजर रहा था, जो राजशाही के खिलाफ था। माओवादी आंदोलन ने गरीबों, बेरोजगारों और असमानता के मुद्दों को उठाया था। इस आंदोलन का नेतृत्व प्रचंड (पुष्पकमल दहाल) कर रहे थे, जो नेपाल में एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना चाहते थे। 2005 में ज्ञानेंद्र ने तख्तापलट किया और सारी सत्ता अपने हाथ में ले ली, लेकिन यह कदम उल्टा पड़ा। 2006 में जनआंदोलन-II के माध्यम से जनता ने सड़कों पर उतरकर ज्ञानेंद्र को झुका दिया। माओवादियों और राजनीतिक दलों के दबाव में ज्ञानेंद्र को झुकना पड़ा और 28 मई 2008 को संविधान सभा ने नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। राजशाही का अंत हो गया और ज्ञानेंद्र को नारायणहिटी पैलेस छोड़ना पड़ा। वे अब एक निजी नागरिक बन गए थे।

 भारत की ऐतिहासिक भूमिका


नेपाल और भारत के रिश्ते केवल भौगोलिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भी रहे हैं। नेपाल की राजशाही के दौरान भारत ने कई बार नेपाल की मदद की। 1951 में, जब राजा त्रिभुवन राणा शासन के खिलाफ दिल्ली में शरण लेने के लिए आए थे, तब भारत ने उन्हें समर्थन दिया और राणा शासन को समाप्त करने में मदद की। 2008 में राजशाही के खात्मे में भी भारत की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। भारत की खुफिया एजेंसी रॉ ने माओवादी नेता प्रचंड के साथ मिलकर नेपाल में लोकतांत्रिक परिवर्तन की दिशा में मदद की ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके। इसके अलावा, भारत ने नेपाल को बुनियादी ढांचा, शिक्षा और आर्थिक सहायता में भी लगातार मदद दी।

 प्रचंड ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर की थी। 1996 में उन्होंने माओवादी जनयुद्ध की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य नेपाल से राजशाही का अंत और लोकतंत्र की स्थापना था। इस दौरान भारत के साथ उनके रिश्ते अस्पष्ट थे। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, माओवादी नेताओं ने भारत में शरण ली थी, विशेष रूप से दिल्ली में, जहां वे अपनी गतिविधियों का संचालन करते थे। हालांकि भारत सरकार ने कभी माओवादी विद्रोहियों का समर्थन नहीं किया। इसके विपरीत, भारत ने नेपाल की राजशाही सरकार को सैन्य सहायता प्रदान की थी। 2006 में माओवादी आंदोलन के समापन और शांति समझौते के बाद प्रचंड मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हुए। इस दौरान भारत ने नेपाल में लोकतंत्र की बहाली और माओवादी नेताओं को मुख्यधारा की राजनीति में शामिल करने के लिए महत्वपूर्ण मध्यस्थता की। जब प्रचंड ने नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया, तो उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चीन को चुना, जो भारतीय सरकार के लिए चौंकाने वाला कदम था। 

हालांकि, प्रचंड ने बाद में भारत के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश की, लेकिन उनका चीन से नजदीकी बढ़ा। इसके बाद, प्रचंड ने भारतीय सरकार के खिलाफ कई बयान दिए और नेपाल की सेना को निशाना बनाया। इस कदम ने भारत-नेपाल रिश्तों में तनाव को बढ़ा दिया। इसके परिणामस्वरूप, प्रचंड को इस्तीफा देना पड़ा और नेपाल में एक नई गैर-माओवादी सरकार बनी। ### आज की स्थिति: राजशाही की वापसी की मांग आज के समय में नेपाल में अस्थिरता फिर से बढ़ रही है। राजनीतिक दलों पर भ्रष्टाचार के आरोप, आर्थिक संकट और हिंदू सांस्कृतिक पहचान के खत्म होने का डर, जनता के बीच असंतोष का कारण बन रहा है। 

काठमांडू की सड़कों पर लोग "राजा वापस आओ, देश बचाओ" के नारे लगा रहे हैं। कई राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और हिंदू संगठन नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि 80% से ज्यादा हिंदू आबादी वाले देश को सेक्युलर बनाने की कोई जरूरत नहीं है। ज्ञानेंद्र शाह अब 77 साल के हो गए हैं और काठमांडू में चुपचाप रह रहे हैं। उनके पास अभी भी संपत्ति और प्रभाव है, लेकिन वे सत्ता में लौटने की कोई औपचारिक कोशिश नहीं कर रहे। हालांकि, जनता का एक हिस्सा मानता है कि राजशाही के दौर में स्थिरता थी, जो अब गायब हो गई है। दूसरी ओर, माओवादी और लोकतांत्रिक नेता इसे लोकतंत्र के खिलाफ साजिश मानते हैं। 

 नेपाल ने शाही नरसंहार से लेकर राजशाही के अंत तक कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। आज, यह देश एक नई दिशा में खड़ा है, और सवाल यह है कि क्या वह फिर से राजशाही की ओर लौटेगा या लोकतंत्र को मजबूत करेगा। यह सवाल भविष्य ही उत्तर देगा।

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