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जेएनयू में दशहरा पर विवाद: रावण के पुतले पर उमर खालिद और शरजील इमाम की तस्वीरें, छात्रों में झड़प

 12 May 2026

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में विजयादशमी के मौके पर रावण दहन का कार्यक्रम इस बार भी बवाल में बदल गया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े छात्रों ने रावण के पुतले पर जिन चेहरों को लगाया, उसने विवाद को और गहरा कर दिया। पुतले पर पूर्व JNU छात्र नेता उमर खालिद, शरजील इमाम, चारु मजूमदार और नक्सल आंदोलन से जुड़े कनू सान्याल की तस्वीरें चिपकाई गईं। इस कदम का वामपंथी संगठनों से जुड़े छात्रों ने जमकर विरोध किया। आरोप है कि बवाल इतना बढ़ा कि जूते-चप्पल और पत्थर फेंके गए। 


JNU छात्रसंघ (JNUSU) का कहना है कि जब उमर खालिद और शरजील इमाम अभी कोर्ट ट्रायल का सामना कर रहे हैं, तब उन्हें दोषी ठहराते हुए रावण के प्रतीक के तौर पर दिखाना न सिर्फ अनुचित है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाना भी है। छात्रसंघ ने यह भी कहा कि दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ता इन मामलों पर चिंता जता चुके हैं। AISA ने सवाल किया कि अगर ABVP वास्तव में राष्ट्र-विरोधी चेहरों का दहन करना चाहता है, तो नथुराम गोडसे का चेहरा क्यों नहीं लगाया? संगठन का कहना था कि "क्या गोडसे को ABVP आतंकवादी नहीं मानता?

ABVP का पलटवार


ABVP के जेएनयू मंत्री ने आरोप लगाया कि शोभा यात्रा के दौरान लेफ्ट संगठनों से जुड़े छात्रों ने पथराव किया और महिलाओं पर हमला किया। संगठन ने कहा कि यह बेहद शर्मनाक है और प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। वहीं JNUSU के जॉइंट सेक्रेटरी वैभव मीणा ने कहा कि “विजयादशमी धर्म की अधर्म पर जीत का प्रतीक है। नक्सली, माओवादी और वामपंथी सोच इस देश को तोड़ने का काम करती है। इसलिए हम उनके ‘आदर्शों’ का दहन कर रहे हैं, उन्होंने कहा। मीणा ने यह भी कहा कि शरजील इमाम, अफजल गुरु, चारु मजूमदार और कनू सान्याल जैसे चेहरों को वह असुरी शक्तियां मानते हैं।”

त्योहार और विवाद: पुराना पैटर्न


JNU में यह पहली बार नहीं है कि कोई त्यौहार विवाद में बदला हो। हर साल अलग-अलग मौके पर छात्रों के बीच वैचारिक संघर्ष टकराव में बदलता रहा है। राम नवमी विवाद (अप्रैल 2022)- द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक ABVP ने कावेरी हॉस्टल में डिनर के दौरान शाकाहारी भोजन की मांग की थी। लेकिन जब मेन्यू में मांसाहारी खाना भी शामिल हुआ तो इसे लेकर झगड़ा हुआ। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला और वामपंथी संगठनों को छात्रों को भड़काने का जिम्मेदार ठहराया गया।

 महिषासुर विवाद: कुछ साल पहले AIBSF नामक संगठन ने पर्चे बांटे थे जिनमें महिषासुर को दलित समुदाय का प्रतीक बताकर महिषासुर शहादत दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा गया। यह ठीक विजयादशमी के समय हुआ। ABVP और लेफ्ट संगठनों के बीच झगड़ा इतना बढ़ा कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और पर्चे छापने वालों पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का केस दर्ज हुआ। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए कई पर्यवेक्षक मानते हैं कि JNU के त्योहार अब सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं रह गए, बल्कि वैचारिक लड़ाई का अखाड़ा बन चुके हैं।

कौन हैं शरजील इमाम? शरजील इमाम का नाम पहली बार सुर्खियों में 2019-20 के दौरान आया जब नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। जनवरी 2020 में एक भाषण के दौरान उन्होंने कहा था कि असम को भारत से अलग-थलग किया जा सकता है। इस बयान को भड़काऊ मानते हुए उनके खिलाफ कई केस दर्ज किए गए। इमाम को 28 जनवरी 2020 को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और उन पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत केस लगाया। हालांकि 2024 में उन्हें कई मामलों में जमानत मिली, लेकिन असम अलगाव वाले बयान से जुड़ा केस अब भी जारी है और वह असम जेल में बंद हैं।

उमर खालिद पर आरोप- उमर खालिद JNU छात्र राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। 2016 के देशद्रोह केस में उनका नाम प्रमुखता से आया, हालांकि केस अब भी अदालत में लंबित है। 2020 दिल्ली दंगों में भी उन पर साजिश का आरोप लगाया गया। पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने दंगों से पहले कई बैठकों में हिस्सा लिया।खालिद पर भी UAPA के तहत केस दर्ज है। उन्होंने खुद को निर्दोष बताया है और कहा है कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी उनकी गिरफ्तारी पर चिंता जताई है।

सवाल बड़ा है, पुतले की राजनीति या वैचारिक टकराव? JNU का इतिहास बताता है कि यहां रावण दहन हो या महिषासुर शहादत दिवस हर सांस्कृतिक आयोजन राजनीतिक टकराव का मंच बन जाता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ।ABVP जहां रावण को राष्ट्रविरोधी चेहरों के प्रतीक के तौर पर दिखाना चाहती है, वहीं लेफ्ट संगठन इसे न्यायिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला मानते हैं। AISA का कहना है कि अगर रावण बुराई का प्रतीक है, तो उसमें केवल लेफ्ट या मुस्लिम नाम जोड़ना क्यों? गोडसे और बलात्कारियों को क्यों छोड़ा जा रहा है? इस बीच, प्रशासन ने फिलहाल किसी भी कार्रवाई की घोषणा नहीं की है। लेकिन छात्र राजनीति पर नज़र रखने वाले विश्लेषक कहते हैं कि जब तक JNU में विचारधाराओं का यह टकराव जारी रहेगा, तब तक विजयादशमी जैसे सांस्कृतिक पर्व भी राजनीतिक प्रतीकवाद से अलग नहीं हो पाएंगे।