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पहले कालिख, फिर अंडे और अब थूक चाटने चल दिए केजरीवाल !! धिक्कार है

 09 May 2019

आज मैं किस विषय पर लिख रहा हूँ मुझे नहीं पता क्योंकि राजनीति विषयहीन और मुद्दाहीन हो चुकी है. 

                और इसकी शुरुआत तब ही हो गयी थी जब एक आम आदमी अपनी नौकरी छोड़ आंदोलन करता है, लाठी डंडे खाता है और फिर राजनैतिक पार्टी बनाकर जनता के हक की लड़ाई लड़ने की बात कहता है. पार्टी बनती है, पार्टी से प्रशांत भूषण जैसे पढ़े लिखे वकील को बहार जाने के लिए मजबूर किया जाता है. फिर योगेंद्र यादव जैसे इंटेलेक्टुअल को भी मजबूरन पार्टी छोड़नी पढ़ती है. खैर तब भी जनता यही कहती है की केजरीवाल अपने सिद्धांतों के लिए योगेंद्र यादव के सामने थोड़े झुकेंगे, जो सरकारी नौकरी छोड़कर आया और योगेंद्र यादव भी अपने सिद्धांतों के लिए क्यों ही केजरीवाल के सामने झुकें. जो हुआ सही हुआ. जनता ने इसे भी एक बार को स्वीकारा. जनता उसपर भी कुछ नहीं बोली जब कुमार विश्वास पार्टी छोड़ चले गए और मान लिया गया की कुमार विश्वास का कोई सिंद्धांत ही नहीं था.

अब तक जो हो रहा था वो सिंद्धान्तों को लेकर हो रहा था. उन सिद्धांतों को लेकर जिसकी वजह से यह आंदोलन शुरू हुआ. जिसकी वजह से पार्टी बनी. लेकिन अब जो हो रहा है वो उन्ही सिद्धांतों को पिलीत करने की क्रिया है.

क्योंकि शायद केजरीवाल भूल गए की
जब जब उसके मुँह पर कालिख पोती गयी, उसे अण्डों से नहलाया गया तब तब जनता ने उसका साथ दिया और कहा की थूक दो ऐसे नेताओं के मुँह पर जो हमारे लिए नहीं बने और फिर बाद में जनता ने ही उन्हें दिल्ली की चाबी थमाई. लेकिन फिर क्या हुआ वही जो 1947 से होता आया.

ये एक मौका था राजनीति बदलने का, युवाओं के लिए मिसाल पेश करने का, की सच और सही तरीके से भी राजनीति की जा सकती है. लेकिन केजरीवाल जी ने सब गुड़ गोबर कर दिया.
जिस शिला दीक्षित के सामने लड़े, उसको हराया और विधानसभा से बहार का रास्ता दिखाया. आज ऐसी क्या नौबत आ गयी की उसी के सामने झुकना पड़ रहा है, उसी कांग्रेस के सामने गिड़गिड़ाना पड़ रहा है.

इसके पहले जो भी हुआ वो सिद्धांतों की वजह से हुआ, वो गलत हो सकता है लेकिन पाप नहीं. लेकिन अब जो हो रहा है वो पाप और कुर्सी का नशा है. शायद इसलिए ही कालिख पुतवाने के बाद भी साहब अब थूक चाटने चल दिए.